नई दिल्ली. गॉल के मैदान पर जब भारतीय टीम अपना 600वां टेस्ट खेलने उतरी तो इतिहास के कुछ ऐसे पन्ने सामने आ गए जिसकी कहानी आज के दौर के क्रिकेटर्स को हैरान करने पर मजबूर कर देगी. टी-20 के दौर में 5 दिन का टेस्ट देखना और मैदान पर जाना फैंस को भारी पड़ता है तो जरा सोचिए वो समय जब टाइमलेस टेस्ट मैच खेले जाते थे और मैच 12 दिन तक चलने के बाद भी ड्रा हो जाया करते थे.
क्रिकेट के 149 साल से ज्यादा लंबे इतिहास में एक ऐसा मैच भी खेला गया, जिसने समय की सीमाओं को पूरी तरह तोड़ दिया था. 1939 में डरबन के मैदान पर दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के बीच खेला गया ‘टाइमलेस टेस्ट’ क्रिकेट इतिहास का सबसे अनोखा और कभी न भूलने वाला अध्याय है. बिना किसी समय सीमा के शुरू हुआ यह मुकाबला पूरे 12 दिनों तक खिंचा, जिसमें 43 घंटे से ज्यादा समय तक गेंद और बल्ले की जंग चली. दोनों टीमों ने मिलकर कुल 1,981 रन बनाए, जो आज भी एक रिकॉर्ड है लेकिन इस ऐतिहासिक महामुकाबले का अंत किसी हार-जीत से नहीं, बल्कि एक समुद्री जहाज की सीटी से हुआ.
रनों का पहाड़ और ऐतिहासिक लक्ष्य
मार्च 1939 में डरबन के किंग्समीड मैदान पर सीरीज का पांचवां और आखिरी टेस्ट मैच शुरू हुआ तो नियमों के मुताबिक, यह मैच तब तक खेला जाना था जब तक कोई नतीजा न निकल आए. दक्षिण अफ्रीका ने पहली पारी में 530 रन बनाए, जिसके जवाब में इंग्लैंड ने 316 रन जोड़े. दूसरी पारी में दक्षिण अफ्रीका ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 481 रन बनाए और इंग्लैंड के सामने जीत के लिए 696 रनों का विशाल और असंभव सा दिखने वाला लक्ष्य रखा.
जीत के करीब इंग्लैंड और मौसम का मिजाज
चौथी पारी में इस पहाड़ जैसे लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की टीम ने गजब का साहस दिखाया. बिल एडरिच के शानदार 219 रन और कप्तान वॉली हैमंड की बेहतरीन बल्लेबाजी की बदौलत इंग्लैंड ने मैच पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली. खेल के 12वें दिन तक इंग्लैंड ने 5 विकेट के नुकसान पर 654 रन बना लिए थे. अब इतिहास रचने और मैच जीतने के लिए उन्हें सिर्फ 42 रनों की जरूरत थी, जबकि उनके हाथ में 5 विकेट सुरक्षित थे. इंग्लैंड की जीत बिल्कुल तय लग रही थी, लेकिन तभी कुदरत और समय ने खेल का रुख बदल दिया.
जब जीत पर भारी पड़ा ‘जहाज का सफर’
जैसे ही इंग्लैंड की टीम जीत के मुहाने पर पहुंची, डरबन में भारी बारिश शुरू हो गई और खेल को रोकना पड़ा लेकिन इंग्लैंड के सामने बारिश से भी बड़ी एक और चुनौती खड़ी थी वक्त की कमी। दरअसल, इंग्लैंड की टीम को अपने देश वापस लौटने के लिए केपटाउन से एक समुद्री जहाज पकड़ना था. वह जहाज पहले से शेड्यूल था और अगर टीम उस दिन डरबन से ट्रेन पकड़कर केपटाउन के लिए रवाना नहीं होती, तो उनकी घर वापसी का जहाज छूट जाता. उस दौर में आज की तरह हवाई सफर की सहूलियतें नहीं थीं, इसलिए जहाज छोड़ना मुमकिन नहीं था.
ड्रॉ पर खत्म हुआ महामुकाबला
बारिश और ट्रेन पकड़ने की मजबूरी के कारण दोनों कप्तानों और अंपायरों ने आपसी सहमति से मैच को यहीं रोकने का फैसला किया. इस तरह 12 दिन की ऐतिहासिक टक्कर, 43 घंटे से ज्यादा की खेल अवधि और 1,981 रनों के अंबार के बाद भी इस मैच का कोई नतीजा नहीं निकल सका और इसे ‘ड्रॉ’ घोषित करना पड़ा. यह मैच क्रिकेट इतिहास का आखिरी ‘टाइमलेस टेस्ट’ साबित हुआ. इस मैच के बाद दुनिया ने समझ लिया कि बिना समय सीमा के टेस्ट मैच कराना व्यावहारिक नहीं है. इसके तुरंत बाद द्वितीय विश्व युद्ध भी शुरू हो गया, जिसने खेल की दुनिया को बदल कर रख दिया. डरबन का यह मैदान आज भी उस खेल का गवाह है जहां क्रिकेट की हार या जीत नहीं हुई थी, बल्कि समय और एक समुद्री जहाज ने इतिहास के सबसे बड़े मुकाबले का फैसला किया था.


