नई दिल्ली. क्रिकेट को अक्सर ‘अनिश्चितताओं का खेल’ कहा जाता है. लेकिन टेस्ट क्रिकेट एक ऐसा मंच है जहां गेंद और बल्ले से ज्यादा इंसान के सब्र की परीक्षा होती है. यहां हर रन बनाने के लिए पसीना बहाना पड़ता है और जब बात शतक जड़ने की हो, तो यह धैर्य कई गुना बढ़ जाता है. क्रिकेट के इतिहास में कुछ ऐसी पारियां भी दर्ज हैं, जहां बल्लेबाजों ने मैदान पर रन बरसाने के बजाय समय को मानो रोक सा दिया था. उन 5 ‘सुस्त’ पारियों के बारे में जानते हैं, जो क्रिकेट इतिहास के सबसे धीमे शतकों के रूप में दर्ज हो चुकी हैं.
साल 1977 में लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में इंग्लैंड की खतरनाक गेंदबाजी के सामने पाकिस्तान के सलामी बल्लेबाज मुदस्सर नजर (Mudassar Nazar) जब मैदान पर उतरे, तो किसी ने नहीं सोचा था कि वे टेस्ट इतिहास का सबसे धीमा शतक बनाने जा रहे हैं. मुदस्सर ने क्रीज को अपनी जागीर बना लिया था. गेंदबाज आए, गेंद फेंकी और मुदस्सर उसे आराम से रक्षात्मक अंदाज में खेलते रहे. मिनट बीतते गए, घंटे गुजरते गए और दर्शक भी क्रीज पर इस अनोखी ढाल को देखकर हैरान रह गए. आखिर 557 मिनट (लगभग 9 घंटे और 17 मिनट) की मैराथन बल्लेबाजी के बाद उन्होंने अपना शतक पूरा किया. यह पारी क्रिकेट इतिहास में धैर्य और संयम की सबसे बड़ी मिसाल बन गई, जिसे आज भी सबसे धीमे शतक के रूप में याद किया जाता है.
टेस्ट क्रिकेट की पांच सबसे सुस्त शतक.
डरबन का सन्नाटा, डैकी मैकग्लेव का चट्टानी रूप
साल 1957-58 के दक्षिण अफ्रीका दौरे पर ऑस्ट्रेलिया की टीम ने मेजबानों पर शिकंजा कस रखा था. डरबन टेस्ट में दक्षिण अफ्रीका भारी दबाव में थी और टीम को हार से बचाने के लिए किसी को चट्टान की तरह डटना था. यह जिम्मेदारी उठाई डैकी मैकग्लेव (Jackie McGlew) ने. मैकग्लेव ने रन बनाने की जल्दी बिल्कुल छोड़ दी. उनका पूरा ध्यान केवल विकेट पर टिके रहने और ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को थकाने पर था. उन्होंने क्रीज पर पूरे 545 मिनट बिताए और अपना शतक पूरा किया. उनकी इस बेहद धीमी लेकिन साहसी पारी की बदौलत दक्षिण अफ्रीका उस मैच में अपनी साख बचाने में कामयाब रहा.
हरारे में असंका गुरुसिन्हा की दीवार
1994-95 में श्रीलंका की टीम जिम्बाब्वे के दौरे पर थी. हरारे का मैदान और मेजबान गेंदबाजों की सधी हुई लाइन-लेंथ के सामने श्रीलंकाई बल्लेबाज संघर्ष कर रहे थे. ऐसे में असंका गुरुसिन्हा (Asanka Gurusinha) ने मोर्चा संभाला. गुरुसिन्हा का अंदाज हमेशा से जुझारू रहा था, लेकिन इस मैच में उन्होंने धैर्य की सारी हदें पार कर दीं. वे क्रीज पर एक-एक रन के लिए तरसते रहे, लेकिन उन्होंने अपना विकेट नहीं गंवाया. 535 मिनट तक मैदान पर टिके रहने के बाद जब उन्होंने अपना शतक पूरा किया, तो उनकी इस पारी ने टीम को बेहद मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया.
कोलंबो का महासंग्राम, जेफ क्रो का संघर्ष
1986-87 में न्यूजीलैंड की टीम श्रीलंका की सरजमीं पर टेस्ट मैच खेल रही थी. कोलंबो के मैदान पर न्यूजीलैंड को अपनी पहली पारी में एक बड़ी साझेदारी की सख्त जरूरत थी. कप्तान जेफ क्रो (Jeff Crowe) खुद मैदान पर उतरे और जिम्मेदारी संभाली. श्रीलंकाई स्पिनरों की फिरकी के सामने जेफ क्रो ने रक्षात्मक रणनीति अपनाई. वे हर एक गेंद को बेहद ध्यान से परखकर खेल रहे थे. मैदान पर 516 मिनट गुजारने के बाद उन्होंने अपना शतक पूरा किया. उनकी इस शतकीय पारी ने न केवल कीवी टीम को संभाला बल्कि यह साबित कर दिया कि जरूरत पड़ने पर आक्रामक बल्लेबाज भी सब्र की मिसाल बन सकते हैं.
जिम्बाब्वे के खिलाफ संजय मांजरेकर का संयम
वर्ष 1992-93 में भारतीय टीम जिम्बाब्वे के ऐतिहासिक दौरे पर थी. हरारे की पिच पर जिम्बाब्वे के गेंदबाजों ने भारतीय बल्लेबाजों को बांधकर रखा हुआ था. इस मुश्किल परिस्थिति में भारत के मध्यक्रम के बल्लेबाज संजय मांजरेकर (Sanjay Manjrekar) ने क्रीज पर खूंटा गाड़ दिया. मांजरेकर की बल्लेबाजी तकनीक हमेशा से बहुत सटीक मानी जाती थी. इस मैच में उन्होंने अपनी उसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए गेंदबाजों को पूरी तरह से हतोत्साहित कर दिया. उन्होंने बिना कोई जोखिम उठाए 500 मिनट मैदान पर बिताए और अपना धैर्यपूर्ण शतक पूरा किया. मांजरेकर की इस जुझारू पारी ने भारत को मैच में सुरक्षित स्थिति में पहुंचाया.
ये पांचों पारियां इस बात का सबूत हैं कि टेस्ट क्रिकेट सिर्फ चौकों और छक्कों का खेल नहीं है. कभी-कभी मैच और टीम को बचाने के लिए क्रीज पर टिके रहना ही सबसे बड़ी कला बन जाता है. मुदस्सर नजर, डैकी मैकग्लेव, असंका गुरुसिन्हा, जेफ क्रो और संजय मांजरेकर के ये शतक भले ही समय के लिहाज से सबसे धीमे रहे हों, लेकिन क्रिकेट के पन्नों में इनकी अहमियत किसी भी आक्रामक शतक से कम नहीं है.


