West Bengal: पाकुरडीहा में 350 साल पुरानी परंपरा! बहन के त्याग की याद में उबलते घी में हाथ डुबोते हैं युवक


West Bengal News: पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा ज़िले का पाकुरडीहा गांव आज भी एक ऐसी परंपरा निभाता है, जिसकी जड़ें साढ़े तीन सौ साल पहले की एक भावुक और साहसिक कहानी से जुड़ी हैं. अपने भाइयों की जिंदगी बचाने के लिए एक बहन ने जो कठोर तपस्या की थी, उसकी याद में आज भी गांव के युवक माघ महीने के एक खास दिन उबलते घी में अपने हाथ डुबाकर तपस्या करते हैं. यह अनोखी और कष्टसाध्य परंपरा हर साल हजारों लोगों को आकर्षित करती है.

लगभग 350 साल पहले, जब बांकुड़ा के तलडांगरा ब्लॉक का यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था, गांव के लोग पूरी तरह जंगल पर ही निर्भर रहते थे. इन्हीं में एक आदिवासी परिवार था. सात भाई और उनकी एक इकलौती बहन. एक दिन सातों भाई शिकार पर गए और देर रात तक वापस नहीं लौटे. आसपास के घने जंगलों में जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता था. इसलिए बहन को भय सताने लगा कि शायद किसी जंगली जानवर ने उसके भाइयों पर हमला कर दिया है.

बहन की तपस्या और भाइयों का लौटना

इस डर और चिंता में बहन ने कठोर व्रत रखना शुरू किया. वह न केवल भोजन का त्याग करती रही बल्कि अपने देवताओं से लगातार अपने भाइयों की रक्षा की प्रार्थना भी करती रही.

गांव के बुजुर्गों का विश्वास है कि इसी तपस्या और त्याग की शक्ति से कुछ दिनों बाद सातों भाई घायल अवस्था में लेकिन जीवित घर लौट आए. बहन के इस अनोखे बलिदान और प्रेम ने पूरे गांव को प्रभावित किया.

भाइयों ने बहन के त्याग के सम्मान में शुरू किया व्रत

बहनों के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए सातों भाइयों ने एक अनोखी प्रतिज्ञा ली. उन्होंने फैसला किया कि हर साल पौष महीने में व्रत रखेंगे और माघ महीने के एक निश्चित दिन अपनी बहन की अच्छी सेहत और लंबी उम्र की कामना करते हुए उबलते घी में हाथ डुबोएंगे.

इस रस्म को “गुरपीठ व्रत” कहा जाता है. इसमें युवक अपने हाथ खौलते घी में डुबोकर गुड़ से बने पिट्ठे पर सेंकते हैं. यह व्रत न केवल साहस मांगता है, बल्कि इसे मानने वालों के मन में अपनी बहनों के प्रति गहरी श्रद्धा होती है.

गांव के युवाओं ने परंपरा को आगे बढ़ाया

समय बीतने के साथ सात भाइयों की यह तपस्या एक पारंपरिक रिवाज बन गई. गांव के अन्य युवक भी इस व्रत में शामिल होने लगे. उनका मानना था कि यह केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि बहन–भाई के रिश्ते का अनूठा सम्मान है. धीरे-धीरे यह परंपरा इतना लोकप्रिय हो गई कि आसपास के कई गांवों के लोग भी इसे देखने के लिए आने लगे.

गांव में मेला जैसा माहौल

माघ महीने के इस खास दिन पाकुरडीहा के मैदान में बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं. विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग इस अनोखे आयोजन को देखने के लिए आते हैं. समय के साथ यह पूरा कार्यक्रम एक बड़े मेले का रूप ले चुका है. खौलते घी में हाथ डालते हुए युवकों को देखना लोगों के लिए आश्चर्य का विषय होता है, पर गांव वालों का विश्वास है कि यह परंपरा शुभ और पवित्र है.

बहन-भाई के रिश्ते का दुर्लभ उदाहरण

आज के समय में ऐसे व्रत बहुत कम देखने को मिलते हैं जहाँ भाई अपनी बहनों के लिए शारीरिक कष्ट सहकर भी उनकी भलाई की कामना करते हों. पाकुरडीहा का यह रिवाज न केवल बंगाल बल्कि पूरे देश में अपने तरह का अनूठा और दुर्लभ उदाहरण है. यह परंपरा दिखाती है कि सदियों पुराने मूल्य—प्यार, त्याग और परिवार—आज भी जीवित हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहे हैं.



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