पाकिस्तान क्रिकेट का वो काला दिन जब कप्तान इंजमाम संग हुआ अपराधियों जैसा सलूक, पूरी टीम के लिए गए फिंगरप्रिंट


तारीख 18 मार्च, 2007; जगह जमैका का आलीशान पेगासस होटल. ठीक 19 साल पहले आज ही के दिन कैरिबियाई हवाओं में क्रिकेट का खुमार होना चाहिए था लेकिन वहां पसरा था तो सिर्फ एक खौफनाक सन्नाटा. एक दिन पहले ही क्रिकेट की फिसड्डी माने जाने वाली आयरलैंड ने पाकिस्तान को पटखनी देकर वर्ल्ड कप से बाहर का रास्ता दिखाया था. पूरी दुनिया पाकिस्तानी टीम के खराब प्रदर्शन पर थू-थू कर रही थी, लेकिन कुदरत ने अभी सबसे क्रूर मंजर दिखाना बाकी था. सुबह के साढ़े दस बजे थे. होटल के कमरे नंबर 1204 का दरवाजा जब खोला गया तो अंदर पाकिस्तान टीम के मुख्य कोच बॉब वूल्मर अपने बाथरूम के फर्श पर बेसुध पड़े थे. उनके मुंह से झाग निकल रहा था और आंखें पथरा चुकी थीं. कुछ ही घंटों में खबर आग की तरह फैली कि बॉब वूल्मर नहीं रहे. लेकिन यह सिर्फ एक मौत नहीं थी. जमैका पुलिस के एक बयान ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया. वूल्मर का कत्ल हुआ है, उनका गला घोंटा गया है!

पाक टीम के लिए गए फिंगरप्रिंट-DNA सैंपल
कप्‍तान इंजमाम-उल-हक और सीनियर खिलाड़ी मोहम्‍मद यूनुस और शोएब मलिक और बाकी सब को जैमेका पुलिस ने मुजरिमों की कतार में खड़ा कर दिया था. खेल का मैदान एक ‘क्राइम सीन’ में तब्दील हो गया. रात भर वर्ल्ड कप जीतने के सपने देखने वाले खिलाड़ी अब पुलिस के सामने फिंगरप्रिंट और DNA सैंपल दे रहे थे. हर पाकिस्तानी खिलाड़ी शक के घेरे में था. क्या यह हार का गुस्सा था? क्या इसके पीछे मैच फिक्सिंग का कोई खूनी सिंडिकेट था? या फिर पाकिस्तान क्रिकेट के भीतर ही कोई ‘विभीषण’ छिपा था? पाकिस्‍तान के लिए यह सिर्फ एक कोच की मौत नहीं थी बल्कि यह दुनिया के सामने उसकी साख और जमीर का सरेआम नीलाम होना था. खिलाड़ी अपनी जर्सी नहीं बल्कि अपना चेहरा छिपाकर भागने को मजबूर थे. क्रिकेट की बिसात पर शुरू हुआ यह खेल अब मौत की मिस्ट्री बन चुका था, जिसने पाकिस्तान क्रिकेट को हमेशा-कैरबियन समंदर की उन लहरों के बीच शर्मसार कर दिया.

बॉब वूल्मर केस: तारीख-दर-तारीख पूरा घटनाक्रम

·         18 मार्च 2007: आयरलैंड से हारकर वर्ल्ड कप से बाहर होने के अगले ही दिन बॉब वूल्मर जमैका के पेगासस होटल के कमरे में बेहोश मिले.  अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

·         22 मार्च 2007: जमैका पुलिस ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि वूल्मर की प्राकृतिक मौत नहीं हुई बल्कि उनका ‘मर्डर’ हुआ है.  पैथोलॉजिस्ट की रिपोर्ट में ‘गला घोंटने’ की बात कही गई.

·         23-26 मार्च 2007: पाकिस्तानी टीम के खिलाड़ियों से पूछताछ शुरू हुई.  इंजमाम-उल-हक, मुश्ताक अहमद और अन्य खिलाड़ियों के DNA सैंपल लिए गए.  पूरी टीम को जमैका में ही रुकने का आदेश दिया गया.

·         अप्रैल 2007: जांच में स्कॉटलैंड यार्ड और इंटरपोल की एंट्री हुई.  अफवाहें उड़ने लगीं कि वूल्मर को जहर दिया गया था या मैच फिक्सिंग गिरोह ने उनकी हत्या करवाई है.

·         मई 2007: जहर दिए जाने की खबरें मीडिया में तैरने लगीं लेकिन पाकिस्तानी जांचकर्ताओं ने हत्या के सबूतों की कमी की बात कही.

·         12 जून 2007: महीनों की जांच और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय के बाद जमैका पुलिस ने पलटी मारी.  कमिश्नर लुसियस थॉमस ने पुष्टि की कि वूल्मर की हत्या नहीं हुई थी बल्कि उनकी मौत ‘प्राकृतिक कारणों’ से हुई थी.

जब दुनिया के सामने शर्मिंदा हुआ पाकिस्तान

यह पाकिस्तान क्रिकेट के इतिहास का सबसे शर्मनाक वर्ल्‍ड कप था.  मैदान पर प्रदर्शन इतना खराब था कि पाकिस्‍तान की टीम जिम्बाब्वे और आयरलैंड जैसी टीमों से संघर्ष कर रही थी.  लेकिन वूल्मर की मौत के बाद टीम के साथ जो हुआ उसने खिलाड़ियों को मानसिक रूप से तोड़ दिया:

1.      अपराधी जैसा व्यवहार: खिलाड़ियों को होटल के कमरों में कैद कर दिया गया और उनके फिंगरप्रिंट्स लिए गए.

2.      मैच फिक्सिंग के आरोप: पूरी दुनिया में यह धारणा बन गई कि वूल्मर किसी बड़े फिक्सिंग रैकेट का खुलासा करने वाले थे इसलिए उन्हें रास्ते से हटा दिया गया.

3.      छिपकर भागना पड़ा: जब जांच के बाद टीम को घर जाने की इजाजत मिली तो खिलाड़ी सार्वजनिक आक्रोश और शर्मिंदगी के कारण मीडिया से नजरें चुराते हुए पाकिस्तान लौटे.

विशेषज्ञों की राय और विवाद

इस केस में सबसे बड़ा विवाद जमैका के पैथोलॉजिस्ट डॉ. एरे शेषैया की रिपोर्ट को लेकर था.  उन्होंने अंत तक दावा किया कि वूल्मर का गला घोंटा गया था.  हालांकि ब्रिटेन, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका के विशेषज्ञों ने उनकी रिपोर्ट को गलत ठहराया.  इस विरोधाभास ने जांच को महीनों तक भटकाए रखा और पाकिस्तान क्रिकेट को ‘हत्या की साज़िश’ के साये में जीने पर मजबूर किया.

क्रिकेट, दबाव और व्यवस्था की हार

बॉब वूल्मर की मौत का यह मामला महज एक पुलिस जांच नहीं थी बल्कि यह क्रिकेट जगत के गहरे अंधेरे को दर्शाता था.

·         व्यवस्थागत खामियां: जमैका पुलिस की जल्दबाजी में दी गई मर्डर थ्योरी ने एक देश की पूरी नेशनल टीम को संदिग्ध बना दिया.  बिना पुख्ता फोरेंसिक सबूतों के हत्या का ऐलान करना पेशेवर चूक थी.

·         मैच फिक्सिंग का डर: इस घटना ने साबित किया कि क्रिकेट में मैच फिक्सिंग का डर इतना गहरा है कि किसी भी प्राकृतिक मौत को तुरंत सट्टेबाजी के काले कारोबार से जोड़कर देखा जाने लगता है.

·         खिलाड़ियों पर दबाव: उस दौर में पाकिस्तानी टीम के भीतर धार्मिक मतभेद और कोचिंग शैली को लेकर भी तनाव की खबरें थीं.  वूल्मर की मौत ने खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर बड़े सवाल खड़े किए.

निष्कर्ष: अंततः वूल्मर की मौत को प्राकृतिक माना गया लेकिन उस तीन महीने की जांच ने पाकिस्तान क्रिकेट की साख को जो चोट पहुंचाई, उसकी भरपाई करने में टीम को कई साल लग गए.  आज भी क्रिकेट प्रेमी जब 2007 के 50 ओवरों के वर्ल्ड कप को याद करते हैं तो उन्हें चौके-छक्के नहीं, बल्कि पेगासस होटल का वो कमरा और पाकिस्तान क्रिकेट की वो बदहाली याद आती है.



Source link


Discover more from News Link360

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Discover more from News Link360

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading