करीब 1200 साल पुराने इस मंदिर की परंपराएं आज भी वही श्रद्धा और निर्देशों के साथ घटती हैं, जो इसकी बाकी मूर्तियों से अलग-अलग जगह हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि विश्वास और मानसिक संतुलन का भी माध्यम है। यही वजह है कि मंदिर में हर दिन भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
रक्त कंबला पूजा क्या है?
अर्थ: ‘रक्त’ का अर्थ है लाल या रक्त से संबंधित और ‘कंबला’ का अर्थ है ठंडा या लाल कपड़ा।
उद्देश्य: यह पूजा मुख्य रूप से त्वचा रोग (त्वचा रोग), त्वचा वृद्धि के दर्द के लिए की जाती है।
सिद्धांत: ऐसा माना जाता है कि सूर्य नारायण स्वामी को लाल वस्त्र या विशेष सेवा निर्विकार करने से शारीरिक कष्ट दूर होता है और सूर्य देव आरोग्य प्रदान करते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: यह मंदिर लगभग 1200 साल पुराना है और 450 साल पहले इसे एक जैन रानी ने सात क्षेत्र (मारोली, पडवु, अलापे, बाजल, कम्बलर, जेप्पू और कंकनाडी) के दुखों को दूर करने के लिए पुनर्निर्मित किया था।
450 साल पहले हुआ था पुनर्निर्माण
सात से जुड़ी है मंदिर की कहानी
स्थानीय इतिहास के अनुसार इस मंदिर का पुनर्निर्माण लगभग 450 वर्ष पूर्व एक जैन रानी ने किया था। ऐसा माना जाता है कि उस समय आसपास के सात गांवों में मारोली, पाडवु, अलापे, बाजल, के बॉलर, जेप्पू और कंकनाडी जैसे कई तरह के स्टूडियो से गुजर रहे थे। लोगों की सामग्री को दूर करने और क्षेत्र में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने के उद्देश्य से मंदिर का ढांचा विकसित किया गया है।
मंदिर से जुड़ी एक और दिलचस्प बात यह भी है कि यहां कभी-कभी ऋषियों को “प्रकाश के गोले” का अनुभव हुआ था। इसके बाद इस स्थान पर दिव्य पूजन शुरू हो गया। ये कहानियां आज भी मंदिर की पहचान का हिस्सा हैं.
रक्त कंबला पूजा कैसे होती है?
मरौली श्री सूर्यनारायण मंदिर में यह एक विशेष सेवा है:
संकल्प और तैयारी: अखंड मंदिर के पुजारियों के माध्यम से रक्त कंबला पूजा का संकल्प लेते हैं।
पूजा: पूजा सामग्री में मुख्य रूप से लाल रंग के कपड़े (कंबल), लाल फूल, और सूर्य देव को प्रिय सामग्री का उपयोग किया जाता है।
अर्पण: यह भगवान सूर्यनारायण के भक्तों की सेवा है।
विशेष सेवा: यह आमतौर पर त्वचा संबंधी समस्याओं वाले लोगों द्वारा की जाने वाली एक विशेष सेवा के रूप में आयोजित की जाती है।
मंदिर में हर दिन को भक्तों का तांता माना जाता है
सुबह और शाम की आरती के समय मंदिर का भव्य रूप अलग ही दिखाई देता है। स्थानीय परिवार से लेकर दूर-दराज से आने वाले यहां दर्शन के लिए बहादुरी दिखाते हैं। मंदिर प्रशासन की ओर से प्रतिदिन अन्नप्रसाद की व्यवस्था भी की जाती है, जिसमें दोपहर और रात का भोजन शामिल रहता है।
दिलचस्प बात यह है कि इस पूजा को लेकर लोगों के अनुभव के बारे में भी चर्चा की जाती है। कई मृतकों का इलाज लंबे समय तक चला, बाद में जब राहत नहीं मिली, तब उन्होंने यहां पूजा की। यद्यपि चिकित्सा विज्ञान में वैज्ञानिकता की पुष्टि नहीं होती है, लेकिन आस्था का यह पक्ष लोगों को मंदिर तक खींचा जाता है।
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