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विधवा अंधविश्वास समझाया: क्या सच है पति की मौत के बाद महिला का चेहरा नहीं देखना चाहिए? तीसरी से चली आ रही इस सिद्धांत को लेकर समाज में तरह-तरह की बातें कही जाती हैं। कई लोग इसे अशुभ मानते हैं, तो कुछ इसे सिर्फ नकारात्मक संकेत देते हैं। लेकिन इस धार्मिक ग्रंथ में और साध्य की मूल पृष्ठभूमि क्या है? जानें इस प्रचलित धारणा के पीछे की असली सच्चाई और इससे जुड़ी सीखी हुई किताबों की कहानियां…
विधवा अंधविश्वास की व्याख्या: पति की मृत्यु के बाद महिला का चेहरा ना देखना जैसी बातें समाज में सालों से चली आ रही अंधविश्वास और अंधविश्वासों का हिस्सा हैं। कई जगह इसे हानिकारक माना जाता है, लेकिन धर्मग्रंथों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसका कोई ठोस आधार नहीं है। विशेषज्ञ के अनुसार शोक की स्थिति में महिला को पहचान और सम्मान की आवश्यकता होती है, ना कि भेदभाव की। अलग-अलग समय के साथ लोग अब ऐसी रूढ़ियों को चुनौती दे रहे हैं और इसे सामाजिक कुरीति मान रहे हैं। क्या है इस परंपरा की वास्तविक सच्चाई और कैसे शुरू हुई यह व्याख्या, जानिए इस खास रिपोर्ट में…
बाहरी दुनिया से संपर्क कम
पहले के समय में, अगर किसी परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती थी तो परिवार कई दिनों तक शोक मनाता था। उस दौरान, परिवार के सदस्य बाहरी दुनिया से बहुत कम संपर्क में थे। अन्य लोग भी अपने दूर रहने वाले थे ताकि उन्हें मानसिक शांति और व्यक्तिगत समय मिल सके। उसी समय ऐसा माना जाता था कि पति की मृत्यु के बाद महिला का चेहरा नहीं देखना चाहिए क्योंकि यह उस व्यक्ति के लिए अपशगुन हो सकता है।
आज भी कई स्थानों पर चल रही है यह संस्था
पति की मृत्यु के बाद महिला का चेहरा ना देखना काफी समय तक चला लेकिन शिक्षा और जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ कई लोगों ने ऐसे अंधविश्वासों पर विश्वास करना छोड़ दिया है। लेकिन आज भी कई जगहों पर ऐसी प्रथा चली आ रही है और लोग इन पर विश्वास भी करते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह मात्र एक अंधविश्वास है और इसका अधिकांश भाग कुछ नहीं है।
नहीं होता कोई भी शुभ काम
हिंदू धर्म में किसी के घर में बच्चे का जन्म हो या मृत्यु हो तो दोनों की परिस्थिति में पुतली का जादू होता है। कुछ क्षेत्र में इस अवधि को सूतक कहा जाता है तो कुछ स्थान पर पातक। हालाँकि दोनों में थोड़ा अंतर जरूर है। यथार्थ सूतक का प्रयोग किसी के घर में जन्मे बच्चे की पत्तियाँ के लिए किया जाता है तो वहीं किसी की मृत्यु की जनक को कहा जाता है। जब किसी के घर में मृत्यु हो जाती है तो तब कहीं 11 तो कहीं 13 दिन तक, कहीं कुछ जगह पर जगह महीने तक घर में प्रवेश नहीं किया जाता। इस दौरान कोई पूजा नहीं होती.
चेहरा देखना दुर्भाग्य से नहीं आता
यह कहना सही नहीं है कि किसी का चेहरा देखना दुर्भाग्य से होता है। दुर्भाग्य से और किसी का चेहरा देखना दुर्भाग्य से नहीं आता है। पति को धोखा महिला के जीवन में होता है ये बहुत बड़ा दर्द. ऐसे समय में उसे साझीदार की आवश्यकता होती है। लेकिन कुछ पुरानी पद्धतियों के कारण उसे दूर रखा जा सकता है और उसका चेहरा ना देखने के लिए उसके दुख को भी कहा जाता है और बढ़ाया भी जाता है। आज के दौर में लोगों में शिक्षा की वजह से जागरूकता बढ़ रही है तो ऐसे में अंधविश्वास भी खत्म हो रहा है।
मौत हर इंसान का हिस्सा है
मृत्यु हर इंसान के जीवन का एक स्वभाव है। किसी व्यक्ति की मृत्यु को परिवार के लिए अपशगुन फेल मानवता के खिलाफ है। अच्छा और बुरा हमारे विचार, कर्म और विचारधारा पर प्रतिबंध नहीं है, ना कि किसी के कारण। ऐसी ही गलत धारणाओं को दूर करना और दुख सहन करना लोगों के साथ खड़ा होना बहुत जरूरी है। समाज को भी ऐसी महिलाओं के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। येही करुणा, मानवीय और प्रेम के जोड़े की कीमत हैं।
लेखक के बारे में

पैरा शर्मा हिंदी न्यूज़18 डिजिटल में चीफ सब एडिटर के पद पर हैं। वर्तमान धर्म, ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्र, राशि और वास्तु से जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं। भारतीय धार्मिक ज्योतिष, ज्योतिष शास्त्र, मेडी…और पढ़ें
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