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Harbhajan Singh birthday: पिता के निधन और आर्थिक तंगी के कारण कभी हरभजन सिंह क्रिकेट छोड़कर अमेरिका में ट्रक ड्राइवर बनने का मन बना चुके थे. तब उनकी बहनों के अटूट विश्वास और कप्तान सौरव गांगुली के भरोसे ने इतिहास बदल दिया. जानिए टीम इंडिया के महान ऑफ स्पिनर ‘टर्बनेटर’ के संघर्ष, ऐतिहासिक हैट्रिक, ‘दूसरा’ के जादू और फर्श से अर्श तक पहुंचने की बेहद भावुक और प्रेरणादायक कहानी, जिसने उन्हें विश्व विजेता बनाया.
हरभजन सिंह अमेरिका में जाकर ट्रक चलाना चाहते थे.
नई दिल्ली. क्रिकेट इतिहास के पन्नों में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो सिर्फ रिकॉर्ड्स के बारे में नहीं होतीं, बल्कि वे इंसान के अटूट हौसले, संघर्ष और फर्श से अर्श तक पहुंचने की दास्तान बयां करती हैं. भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसा ही नाम है हरभजन सिंह का. ‘टर्बनेटर’ और ‘भज्जी’ जैसे मशहूर नामों से बुलाए जाने वाले हरभजन सिंह की गिनती दुनिया के उन महानतम ऑफ स्पिन गेंदबाजों में होती है, जिन्होंने अपनी घूमती गेंदों पर दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधर बल्लेबाजों को नाचने पर मजबूर कर दिया. टेस्ट क्रिकेट में 400 से अधिक विकेट लेने वाले वे भारत के पहले ऑफ स्पिनर बने. लेकिन इस ऐतिहासिक मुकाम तक पहुंचने का रास्ता कांटों भरा था.
3 जुलाई 1980 को पंजाब के जालंधर में जन्मे हरभजन सिंह (Harbhajan Singh) को बचपन से ही क्रिकेट का जूनून था. घरेलू स्तर पर अपनी फिरकी का जादू बिखेरने के बाद, उन्हें जल्द ही राष्ट्रीय टीम का बुलावा आ गया. मार्च 1998 में, महज 17 साल की उम्र में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट मैच खेलकर अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज किया. शुरुआती मैचों में उन्होंने अपनी प्रतिभा की झलक दिखाई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की डगर इतनी आसान नहीं थी.
हरभजन सिंह अमेरिका में जाकर ट्रक चलाना चाहते थे.
जब ट्रक ड्राइवर बनने का बना लिया था मन
करियर की शुरुआत के करीब डेढ़ साल बाद ही हरभजन सिंह को खराब फॉर्म के कारण टीम से बाहर कर दिया गया. उस दौर में अनिल कुंबले भारतीय स्पिन गेंदबाजी के मुख्य स्तंभ थे. जब कुंबले चोटिल हुए, तब भी चयनकर्ताओं ने भज्जी की जगह दूसरे खिलाड़ियों को आजमाया. इस उपेक्षा ने युवा हरभजन को गहरे तक निराश कर दिया. इसी बीच, साल 2000 में हरभजन के सिर से पिता का साया उठ गया। अचानक, पूरे परिवार (मां और पांच बहनों) की जिम्मेदारी उनके युवा कंधों पर आ गई. एक तरफ टीम से बाहर होने का दर्द और दूसरी तरफ परिवार की गंभीर आर्थिक स्थिति इन दोहरे संकटों ने भज्जी को भीतर से तोड़ दिया था. हताशा इस कदर बढ़ चुकी थी कि उन्होंने क्रिकेट छोड़ने और अपनी आजीविका चलाने के लिए अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने का पूरा मन बना लिया था.
मोड़ जो जिंदगी बदल दे
इस कठिन समय में भज्जी की बहनों ने उनके भीतर के क्रिकेटर को मरने नहीं दिया. उन्होंने हरभजन को ढांढस बंधाया और दोबारा मैदान पर उतरने के लिए प्रेरित किया. बहनों के अटूट विश्वास के दम पर भज्जी ने रणजी ट्रॉफी में वापसी की और उस सीजन में शानदार गेंदबाजी करते हुए 28 विकेट चटकाए.
गांगुली का भरोसा और ऐतिहासिक कमबैक
साल 2001 का समय भारतीय क्रिकेट के लिए एक नया सवेरा लेकर आया. ऑस्ट्रेलिया की मजबूत टीम भारत के दौरे पर थी और अनिल कुंबले चोट के कारण बाहर थे. ऐसे में तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने हरभजन की प्रतिभा पर भरोसा जताया और उन्हें टीम में शामिल करने की जिद की. गांगुली का यह फैसला भारतीय क्रिकेट के इतिहास को बदलने वाला साबित हुआ. इस ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज के 3 मैचों में हरभजन सिंह ने कंगारू बल्लेबाजों को अपनी उंगलियों पर नचाते हुए कुल 32 विकेट झटके. इसी सीरीज के कोलकाता (ईडन गार्डन्स) टेस्ट में उन्होंने शानदार हैट्रिक ली, जो टेस्ट क्रिकेट में किसी भी भारतीय गेंदबाज द्वारा ली गई पहली हैट्रिक थी. इस सीरीज ने न सिर्फ हरभजन का करियर पुनर्जीवित किया, बल्कि उन्हें टीम इंडिया का मुख्य हथियार बना दिया.
‘दूसरा’ का जादू और विश्व विजेता का सफर
हरभजन सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी आक्रामकता, कभी न हार मानने वाला जज्बा और उनकी रहस्यमयी गेंद ‘दूसरा’ थी. ऑफ स्पिनर होते हुए भी गेंद को बाहर की तरफ निकालने की इस कला ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों को भी दुविधा में डाल दिया. भज्जी केवल टेस्ट के ही नहीं, बल्कि सीमित ओवरों के भी किंग थे। वे भारत की दो सबसे बड़ी ऐतिहासिक जीतों 2007 टी20 वर्ल्ड कप और 2011 वनडे वर्ल्ड कप विजेता टीम के प्रमुख सदस्य रहे. इसके अलावा, निचले क्रम में आकर जरूरत पड़ने पर अपने बल्ले से ताबड़तोड़ रन बनाना भी उनकी खासियत थी.
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कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…और पढ़ें
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