देश में कितने कैंसर डे-केयर सेंटर, इनमें इलाज के लिए कौन-कौन सी मिलती हैं सुविधाएं?
भारत में कैंसर एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है. हर साल लाखों नए मरीज सामने आ रहे हैं और बड़ी संख्या में लोगों की मौत कैंसर से हो रही है. चिंता की बात यह है कि आने वाले वर्षों में कैंसर के मामलों में और तेजी से बढ़ोतरी होने का अनुमान है.
अब तक देश में बेहतर कैंसर इलाज की सुविधाएं ज्यादातर बड़े शहरों तक ही सीमित रही हैं. गांवों और छोटे जिलों के मरीजों को इलाज के लिए बार-बार महानगरों की यात्रा करनी पड़ती है. इससे न सिर्फ इलाज महंगा होता है, बल्कि समय, रोजगार और मानसिक तनाव का बोझ भी बढ़ता है. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए सरकार ने जिला स्तर पर कैंसर डे-केयर सेंटर शुरू करने की योजना बनाई है, ताकि मरीजों को उनके घर के पास ही जरूरी इलाज मिल सके.
देश में कितने कैंसर डे-केयर सेंटर
केंद्रीय बजट 2025 में सरकार ने घोषणा की थी कि देश के हर जिले के अस्पताल में कैंसर डे-केयर सेंटर खोले जाएंगे. इन केंद्रों का मकसद यह है कि मरीजों को रोजमर्रा के कैंसर इलाज के लिए दूर न जाना पड़े. सरकार की योजना के अनुसार वर्ष 2025-26 में 200 नए कैंसर डे-केयर सेंटर शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया. बाद में 297 नए केंद्रों को मंजूरी दी गई. स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, साल के अंत तक देश में पहले से 364 कैंसर डे-केयर सेंटर काम कर रहे थे. इनमें से 75 नए केंद्र शुरू हो चुके हैं. अब कुल मिलाकर देश में 439 कैंसर डे-केयर सेंटर कार्यरत हैं.
कैंसर डे-केयर सेंटर क्या होते हैं?
कैंसर डे-केयर सेंटर ऐसे इलाज केंद्र होते हैं, जहां मरीज को भर्ती होने की जरूरत नहीं होती, मरीज इलाज करवा कर उसी दिन घर लौट सकता है. इन केंद्रों को आमतौर पर 10 बिस्तरों वाली इकाई के रूप में तैयार किया गया है. ये केंद्र बड़े कैंसर अस्पतालों या मेडिकल कॉलेजों से जुड़े होते हैं और उनके मार्गदर्शन में काम करते हैं.
इन कैंसर डे-केयर सेंटरों में कौन-कौन सी सुविधाएं मिलती हैं?
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इन केंद्रों में मरीजों को कई जरूरी सेवाएं मिलती हैं, जैसे कीमोथेरेपी (उसी दिन इलाज और छुट्टी), इलाज से पहले मरीज की जांच (प्री-साइकिल असेसमेंट), कीमोथेरेपी के बाद होने वाले साइड इफेक्ट्स की निगरानी, कंसल्टेशन, मानसिक और भावनात्मक सहयोग के लिए काउंसलिंग, दर्द और अन्य लक्षणों का प्रबंधन, इलाज के बाद फॉलो-अप देखभाल सबसे अहम बात यह है कि ये सभी सेवाएं सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत दी जाती हैं, ताकि मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े.
मरीजों को क्या फायदा होगा?
सरकार का कहना है कि जिला स्तर पर इलाज मिलने से मरीजों को कई तरह के फायदे होंगे. जैसे बड़े शहरों की यात्रा की जरूरत कम होगी, इलाज के दौरान रोजगार और मजदूरी का नुकसान घटेगा, जेब से खर्च होने वाला पैसा कम होगा, इलाज बीच में छोड़ने की समस्या घटेगी, इलाज पूरा करने की संभावना बढ़ेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि पास में इलाज मिलने से मरीजों का भरोसा बढ़ता है और वे नियमित रूप से इलाज ले पाते हैं.
कौन-कौन से राज्य आगे हैं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा और केरल में ये केंद्र अच्छे से काम कर रहे हैं. तेलंगाना ने अपने सभी 27 स्वीकृत केंद्र शुरू कर दिए हैं. अन्य राज्यों में भी चरणबद्ध तरीके से केंद्र खोले जा रहे हैं. एक अध्ययन के मुताबिक, एक बार ओपीडी में दिखाने का औसत खर्च लगभग 8,000 रुपये होता है. अस्पताल में भर्ती होने पर औसत खर्च करीब 39,000 रुपये और एक कैंसर मरीज का सालाना सीधा खर्च करीब 3.3 लाख रुपये तक होता है. ऐसे में जिला स्तर पर मुफ्त या सस्ता इलाज मरीजों के लिए बहुत बड़ी राहत साबित हो सकता है.
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