Sadhvi Prem Baisa Death: साध्वी प्रेम बाईसा का अंतिम संस्कार क्यों नहीं होगा, क्यों दी जाएगी समाधि
Sadhvi Prem Baisa Death: कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा की मृत्यु की खबरें धीरे-धीरे तूल पकड़ने लगी है. उनकी मौत आत्माहत्या थी या हत्या की साजिश अभी इससे पर्दा उठा नहीं है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही यह साफ हो पाएगा. फिलहाल पुलिस साध्वी प्रेम बाईसा की मौत की जांच में जुटी है.
साध्वी प्रेम बाईसा ने 12 वर्ष की उम्र से ही धर्म की राह पकड़ ली थी. समय के साथ वह कथा और भजनों के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय हो गई थीं. लेकिन महज 25 वर्ष की उम्र में ही उनकी मौत हो गई. बता दें कि, मंगलवार 27 जनवरी को साध्वी प्रेम बाईसा अजमेर से कथा करने के बाद जोधपुर में अपने आश्रम लौटीं. अगले दिन उन्हें सांस देने में तकलीफ हुई. पहले तो उन्हें एक कंपाउंडर द्वारा इंजेक्शन लगाया गया. बाद में हालत बिगड़ी तो अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मृत्यु हो गई.
पैतृक गांव परेऊ में साध्वी प्रेम बाईसा की समाधि
साध्वी प्रेम बाईसा को उनके पैतृक गांव परेऊ में विधि-विधान से समाधि दी गई. बताया जा रहा है कि, जैसे ही साध्वी प्रेम बाईसा का शव पहुंचा, गांव में उनके अनुयायियों की भीड़ उमड़ पड़ी है. साध्वी प्रेम बाईसा ने अपने पैतृक गांव में ही शिव शक्ति धाम नामक आश्रम बनवाया था, जहां आज उन्हें समाधि दी गई.
साध्वी प्रेम बाईसा का दाह संस्कार क्यों नहीं?
आमतौर पर मृत्यु के बाद हिंदू धर्म में दाह संस्कार का विधान होता है. लेकिन साध्वी प्रेम बाईसा का दाह संस्कार न करके उन्हें समाधि दी गई. आइए जानते हैं क्यों नहीं हुआ साध्वी प्रेम बाईसा का दाह संस्कार.
बता दें कि साधु संतों का अंतिम संस्कार समाधि के रूप में किया जाता है, उनका दाह संस्कार नहीं होता. साधु-संतों को मृत्यु के बाद समाधि देना उनके आध्यात्मिक स्तर, तपस्या और सांसारिक मोह-माया से मुक्ति का सम्मान माना जाता है. धार्मिक दृष्टि से साधु-संतों का शरीर पंचमहाभूतों की सीमाओं से परे माना जाता है. इसलिए इनके पार्थिव शरीर को अग्नि में जलाने के बजाय समाधि में विश्राम दिया जाता है.
दाह संस्कार शरीर को जलाकर समाप्त कर देती है, लेकिन समाधि के जरिए साधु-संतों के अस्तित्व को सम्मानपूर्व संजोया जाता है. माना जाता है कि समाधि से आत्मा को शीघ्र मोक्ष मिलता है और आत्मा शुद्ध होती है. साधु-संत व संन्यासी सांसारिक मोह माया से दूर होते हैं, इसलिए भी इनके शरीर को जलाया नहीं जाता है. हिंदू धर्म में जल समाधि को सबसे पवित्र माना जाता है. भगवान राम ने भी सरयू में जल समाधि ली थी.
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
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