इसे सुर्खियों या बाहरी आख्यानों से परिभाषित नहीं किया जाता है, बल्कि इसे हर दिन घरों, चाय की दुकानों, सार्वजनिक स्थानों, संकट के क्षणों और सह-अस्तित्व के शांत कृत्यों में लिखा जाता है।
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