यहां का राजा महल ओरछा रसोईघर श्री रामचन्द्र के दरबार में तब्दील हो गया है यहां की रसोई बनी श्रीरामचंद्र का दरबार, दिसंबर 2009 में चंद्रा ने रखी थी रानी के सा

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राजा महल ओरछा: भारत के मंदिरों का इतिहास और रहस्य भरे हुए हैं। आज हम आपको मध्य प्रदेश के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां प्रभु रसोई में बने हुए हैं। साथ ही यह मंदिर बेहद स्थापत्य और सुंदर आभूषणों जैसा दिखता है। आइए जानते हैं ओरहा के इस भव्य महल के बारे में खास बातें…

जहां भारत में वास्तुकला की सुंदरता, भक्ति और सुंदर चित्रों से भरपूर जगहें दिखती हैं तो भारत में ऐसे स्थानों की कमी नहीं होती है, जहां भारत में कई ऐसे स्थानों की कमी नहीं होती है, जहां वास्तुकला की सुंदरता से भरी जगहें दिखती हैं और भक्ति की कहानियां दिल को छू जाती हैं। मध्य प्रदेश के ओरहा में स्थित राजा महल भी ऐसी ही एक अनोखी जगह है। यहां का सामान्य सा रसोईघर सीमांत भगवान श्रीराम का दिव्य दरबार बन गया है, जहां उनकी पूजा राजा की तरह की जाती है। इस महल से जुड़ी प्राचीन कथा, भक्ति, प्रेम और चमत्कार से भरी हुई है। मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र बसा ओरछा का राजा महल सिर्फ एक भव्य इमारत नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और चमत्कार की अनोखी कहानी है। यहां की रेसिपी आज भी भगवान श्रीराम का दरबार बनती है, जहां राजा की तरह होती है उनकी पूजा।

मुगल और राजपूत वास्तुकला का शानदार संगम – इस महल से जुड़ी किंवदंती इतनी दिलचस्प है कि यहां की यात्रा इतिहास और आस्था दोनों का अनुभव कराती है। इस महल को मुगल-राजपूत वास्तुकला का अद्भुत नमूना भी कहा जाता है। 16वीं शताब्दी में बुंदेला राजा मधुकर शाह द्वारा मुगलकालीन राजा महल और राजपूत वास्तुकला का शानदार संगम है। जहां गीर महल के ठीक बगल में स्थित यह महल अपने मनमोहक मजारों, हवेली खंभों और सुंदर मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। महल के दरबार हॉल में हिंदू पौराणिक कथाओं के दृश्य चित्रित हैं, जो देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षण और जीर्णोद्धार कार्य से महल को अपना पुराना शान वापस पा लिया गया है।

भगवान कृष्ण के परम भक्त थे राजा – किंवदंती के अनुसार, राजा मधुकर शाह भगवान कृष्ण के परम भक्त थे, जबकि उनकी पत्नी रानी गणेश कुँवरी भगवान राम के उपासक थे। एक बार दोनों तीर्थ यात्रा पर निकलें। राजा मथुरा जाना चाहते थे, तो रानी अयोध्या। दोनों के बीच विवादित बहस हुई. गुस्से में राजा ने रानी से कहा कि वह अकेले ही अयोध्या और भगवान राम को साथ लेकर लौटेंगे, बाकी महलों में प्रवेश नहीं मिलेगा। रानी अयोध्या आक्षेपें और पूर्ण श्रद्धा से प्रार्थना करने के लिए। कई बार की प्रतीक्षा के बाद भी जब राम प्रकट नहीं हुए तो निराश होकर उन्होंने सरयू में कूदकर आत्महत्या करने का विचार किया। वही क्षण चमत्कार हुआ. भगवान राम अवतरित हुए और रानी की भक्ति से उनकी भक्ति की तैयारी शुरू हो गई।

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रानी के सामने तीन राखियां – लेकिन उन्होंने रानी के सामने तीन राखियां रखीं। पहली शर्त अयोध्या से ओरछा तक का पूरा सफर पुष्य नक्षत्रों में 24 घंटे की आंतरिक पैदल यात्रा तय करना होगा। दूसरी ओर, जहां भी वे जाते हैं, वहां उनके साथ राजा की सहमति होती है। वहीं, तीसरी शर्त यह है कि ओरछा में वे जहां पहली बार रेस्तरां होंगे, जहां उनका पवित्र मंदिर था। रानी की चाहत ओरछा लौट आई। राजा मधुकर शाह ने भगवान राम को अपना राजतिलक दिया और उनका राज्याभिषेक किया। ऐसे ही राम यहां ‘राम राजा’ के रूप में पूजे जाने लगे। उनके चारों ओर के पहरेदारों को राजसी सम्मान दिया जाता है।

ऐसे में रसोई में राजा राम – कथा के अनुसार, राजा ने भगवान राम के लिए चतुर्भुज मंदिर बनवाना शुरू किया था, लेकिन जब रानी ओरहा की ओर मुड़ीं, तो मंदिर अधूरा था। हिंदू परंपरा के अनुसार, मंदिर बनने के बाद रसोई को भी पवित्र माना जाता है। इसलिए रानी ने भगवान राम को अपनी रसोई में ही व्यवस्थित कर दिया। आज भी ओरहा का राम राजा मंदिर मूल रूप से महल की रसोई है। यही कारण है कि ओर्खा को ‘दिव्य राजधानी’ कहा जाता है। यह भव्य महल न केवल आत्मिक शांति वाला महल है, बल्कि विश्वव्यापी आकर्षण के लिए भी है।

शाम को देखने का दृश्य – शाम के समय राजा के खूबसूरत महल की रोशनी और भी बनी जगहें। यहां गाइडेड टूर ले जाया जा सकता है, जहां ओरछा के इतिहास और राम-रानी की कथा का विस्तार बताया गया है। इसके पास ही स्थित जहां जागीर महल, किले का इतिहास और शाम का साउंड एंड लाइट शो भी होता है। राम राजा मंदिर की आरती का अनुभव अनमोल है। स्थानीय बाज़ारों में टेराकोटा की मूर्तियाँ, चंदेरी सा पेंटिंग, प्लास्टिक के बर्तन और अगरबत्ती के विक्रेता यहाँ आने वाले स्टूडियो का पसंदीदा काम करते हैं।

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