विदेश में लोग नॉनवेज बेचने वाले फिर भी सफल क्यों हैं? प्रेमानन्द जी महाराज ने क्या उत्तर दिया, आप भी सुन लें

प्रेमानन्द जी महाराज: आज के दौर में जहां फास्ट फूड, लाइफस्टाइल और धार्मिक सोच को श्रमिकों का पैमाना फिर से माना जा रहा है, वहीं संतों की बातें लोगों को एक बार अपनी विदेश की तरफ देखने के लिए मजबूर कर रही हैं। हाल ही में संत प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचन का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस दौरान एक भक्त ने सवाल किया कि कलाकारों में रहने वाले लोग कैसे होते हैं, फिर भी वे आर्थिक और सामाजिक रूप से कितने आगे बढ़ जाते हैं?

प्रश्न सुनने में साधारण था, लेकिन प्रेमानन्द जी महाराज ने जो उत्तर दिया, उसने कई लोगों को सलाह पर मजबूर कर दिया। उन्होंने सिर्फ मांसाहार पर ही नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन, मानसिक शांति, भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के महत्व को भी बेहद सरल शब्दों में बताया। यही कारण है कि उनकी बातें लोगों के बीच तेजी से चर्चा में हैं और भारतीय संस्कृति को लेकर गर्व की भावना भी जगा रही हैं।

“समय खुद समझें”- प्रेमानंद जी महाराज पर क्या बोले
भक्त ने महाराज जी से कहा कि वे शाकाहार को सही चित्रण करते हैं और लोगों को इसके बारे में विद्वानों की कोशिश भी करते हैं, लेकिन लोग उनसे बहस कर रहे हैं। इस पर प्रेमानंद जी महाराज ने शांत स्वर में जवाब देते हुए कहा कि हर इंसान को तुरंत समझ नहीं आता, कुछ लोगों को समय समझ आता है। उन्होंने कहा कि मूलनिवासी, बकरा या कोई भी जीव सिर्फ भोजन नहीं करते हैं, वे भी प्राण होते हैं, अगर लोग उनका सेवन बंद कर देते हैं, तो उनकी हत्या भी बंद हो जाएगी। महाराज जी ने आगे कहा था कि किसी भी गलत काम में सिर्फ करने वाला ही नहीं, बल्कि उसे बढ़ावा देने वाला और उसका लाभ लेने वाला भी बराबरी का भागीदार होता है। उनकी ये बात सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही है. कई लोग इसे भारतीय संस्कृति और अहिंसा की सोच से जोड़कर देख रहे हैं। खास बात यह रही कि उन्होंने किसी पर गुस्सा या दबाव बनाने की बात नहीं की, बल्कि समय और समझ को सबसे बड़ा शिक्षक बताया।

“विदेशों की चमक को प्रगतिशील मत समझो”
1. पैसा और सुख हमेशा एक नहीं होता
भक्त ने आगे सवाल किया कि अगर मांसाहार गलत है, तो चरित्र में रहने वाले लोग इतने विकसित और सफल क्यों हैं? इस पर प्रेमानंद जी महाराज ने कहा था कि केवल पैसा आ जाना या भौतिक सुख मिल जाना वास्तविक विकास नहीं होता। उन्होंने कहा कि अगर सिद्धांत में इतना ही आनंद होता, तो वहां के लोग भारत में शांति की तलाश क्यों करते? लोग यहां योग, ध्यान और अध्यात्म साधक क्यों आते हैं? महाराज जी ने साफा से कहा कि बाहरी चमक और अंदर की शांति दोनों अलग-अलग बातें हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आज दुनिया में मानसिक तनाव और अकेलापन तेजी से बढ़ रहा है। बड़े-बस्ती में रहने वाले लोग भी अवसाद, तनाव और रिश्ते की दूरी से जुड़े हैं। ऐसे में सिर्फ आर्थिक कार्मिकों को सफलता मन ने अधूरी नजरिया दी है।

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2. “अपनेपन की कमी सबसे बड़ा दुःख”
प्रेमानंद जी महाराज ने आगे कहा था कि कलाकारों में रहने वाले कई भारतीय आर्थिक रूप से मजबूत जरूर हो जाते हैं, लेकिन उन्हें अपने देश में अपनापन और पारिवारिक भोजन नहीं मिल पाता। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी परंपराएं और इलेक्ट्रॉनिक्स हैं। उनकी इस बात से कई लोग खुद को अप्राप्त नजर आए। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने लिखा कि आधुनिक जीवन में सुविधा तो अच्छी है, लेकिन सार्वभौम कम हो रहा है।

3.बच्चों में बढ़ती अवसाद पर भी बढ़ती चिंता
अध्यात्म और आधुनिक शिक्षा के साथ बातचीत के दौरान प्रेमानंद जी महाराज ने बच्चों में बढ़ते अवसाद और मानसिक तनाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज पढ़ने वाले बच्चों को सिर्फ बाहरी दुनिया की दौड़ सिखाना है, लेकिन अंदर से मजबूत बनने की शिक्षा कम मिल रही है। महाराज जी ने कहा था कि यदि बच्चों को भारतीय इतिहास, संतों की कहानियाँ और अध्यात्म की बातें सिखाई जाती हैं, तो वे मनोवैज्ञानिक बस्ती हैं। उन्होंने सावित्री, अनुसुइया और राजा शिवि जैसे उदाहरण देते हुए बताया कि भारतीय संस्कृति त्याग, दया और करुणा की सीख देती है। राजा शिवी ने उदाहरण देते हुए कहा कि राजा ने अपनी रक्षा के लिए कबूतर के शरीर का मांस तक दान कर दिया था। यह सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि क्वेश्चन के प्रति संवेदना का संदेश है।

4. समाज को क्या संदेश दिया गया प्रेमानंद जी महाराज को
प्रेमानंद जी महाराज ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा जरूरी है, लेकिन उनका साथ अध्यात्म और संस्कार भी जरूरी है, अगर दोनों के साथ तालीम, समान समाज सही मायनों में आगे बढ़ सकता है।

उनकी बातों का असर इसलिए भी सबसे ज्यादा दिख रहा है क्योंकि उन्होंने किसी पर अपनी सोच को आजमाने की कोशिश नहीं की, बल्कि लोगों को खुद की सोच और समझ का संदेश दिया।

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