शादी-विवाह जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला होता है। इसलिए अपने जीवनसाथी की तलाश करते या चुनते समय लोग बहुत सी बातों का ध्यान रखते हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि उसका जीवनसाथी अच्छा, ईमानदार और बेइंतेहा प्यार करने वाला हो। साथ ही वैवाहिक जीवन सुखमय और प्रेम से भरा हो। ज्योतिष के अनुसार, जन्म कुंडली में मौजूद कुछ विशेष विवाह योग वैवाहिक जीवन की गुणवत्ता, सामंजस्य और दीर्घकालिक सुख को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि शादी से पहले कुंडली को अच्छी तरह से मिलाया जाता है। यदि कुंडली में शुभ ग्रहों और भावों का संतुलन हो तो वैवाहिक जीवन में प्रेम, सहयोग और खुशहाली बनी रहती है। तो चलिए जानते हैं कि सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कुंडली में कौनसे योग और ग्रहों का होना जरूरी होता है। वहीं कुंडली में जब यह योग बन बनता है तब संतान की प्राप्ति होती है।
सातवाँ घर
ज्योतिषों के मुताबिक, कुंडली में सप्तम भाव को विवाह, जीवनसाथी और वैवाहिक संबंधों का मुख्य भाव माना जाता है। सप्तम भाव जितना मजबूत होगा जीवनसाथी के साथ संबंध उतने ही मधुर और सहयोगपूर्ण रहने की संभावना होती है। अगर सप्तम भाव शुभ ग्रहों से प्रभावित हो, पाप ग्रहों के गंभीर प्रभाव से मुक्त हो, मजबूत और संतुलित हो तो तो वैवाहिक जीवन में स्थिरता और सामंजस्य देखने को मिलता है।
गुरु और शुक्र की मजबूत स्थिति
कुंडली में शुक्र और गुरु मजबूत हो तो वैवाहिक जीवन सुखमय, मधुर और खुशहाल बना रहता है। बता दें कि शुक्र को प्रेम, आकर्षण, दांपत्य सुख और रोमांस का कारक ग्रह माना जाता है। अगर कुंडली में शुक्र ग्रह उच्च का हो, स्वराशि में हो, शुभ ग्रहों से प्रभावित हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में पीड़ित न हो तो व्यक्ति को वैवाहिक जीवन में प्रेम, आकर्षण और भावनात्मक संतुष्टि प्राप्त होती है। वहीं कुंडली में जब गुरु सप्तम भाव पर दृष्टि डालता हो, सप्तमेश को प्रभावित करता हो और शुभ भावों में स्थित हो तो वैवाहिक जीवन में समझदारी, सम्मान और परिपक्वता बढ़ती है। खासतौर से महिलाओं की कुंडली में गुरु की मजबूत स्थिति अत्यंत शुभ मानी जाती है।
गुरु और शुक्र का शुभ संबंध
जब शुक्र और गुरु के बीच सकारात्मक संबंध बनता है, तो यह विवाह के लिए अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है। यह योग वैवाहिक जीवन में संतुलन लाता है और आपसी सम्मान भी बढ़ाता है। यह शुभ योग परिवार में खुशहाली बनाए रखता है।
नवांश कुंडली (D9 Chart) का शुभ होना
नवांश कुंडली का विशेष महत्व है। अगर कुंडली में सप्तम भाव मजबूत हो, शुक्र और गुरु शुभ स्थिति में हों और विवाह कारक ग्रह पीड़ित न हों तो वैवाहिक जीवन दीर्घकाल तक सुखद और संतुलित बना रहता है।
द्वितीय भाव और सप्तम भाव
अगर कुंडली में द्वितीयेश और सप्तमेश में शुभ संबंध हो, द्वितीय भाव पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो विवाह के बाद परिवार में सामंजस्य और स्थिरता बनी रहती है। ऐसे योग पारिवारिक सहयोग और आर्थिक संतुलन प्रदान करते हैं।
चंद्रमा का मजबूज होना
चंद्रमा मन, भावनाओं और मानसिक संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में कुंडली में चंद्रमा का शुभ और मजबूत होना जरूरी होता है। अगर चंद्रमा कुंडली में शुभ स्थिति में हो, पाप ग्रहों से पीड़ित न हो और गुरु या शुक्र से शुभ संबंध बना रहा हो तो पति-पत्नी के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत रहता है।
मजबूत सप्तमेश (7th House Lord)
सप्तम भाव का स्वामी यानी सप्तमेश विवाह की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब सप्तमेश अपनी उच्च राशि में हो, स्वराशि में स्थित हो, केंद्र या त्रिकोण भाव में हो, शुभ ग्रहों की दृष्टि प्राप्त कर रहा हो तो यह एक अत्यंत शुभ विवाह योग माना जाता है। ऐसे जातकों का वैवाहिक जीवन स्थिर और संतुलित रहता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
यह भी पढ़ें:
कुंडली के कालसर्प दोष से हैं परेशान? सावन शिवरात्रि पर करें ये आसान उपाय, दूर होगा हर संकट
Discover more from News Link360
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
