नई दिल्ली. कुछ समय पहले तक लोग चाहते थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच ज्यादा से ज्यादा क्रिकेट खेला जाए. दोनों टीमों के मुकाबले बेहद रोमांचक होते थे और ब्रॉडकास्टर्स इसे क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्विता के तौर पर पेश करते थे लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. अब भारत और पाकिस्तान जितनी बार आमने-सामने आते हैं, यह प्रतिद्वंद्विता उतनी ही अपनी चमक खोती जा रही है. सच कहें तो दोनों टीमों के बीच जितना कम क्रिकेट हो, उतना ही बेहतर है.
आने वाले एशियाई खेलों को ही देख लीजिए. वहां भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल सकता है, जैसा अभी महिला एशिया कप में देखने को मिल रहा है. शनिवार को जो हुआ, अगर उसे पैमाना माना जाए तो भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबला एकतरफा है. ऐसे मैच को आखिर कितने समय तक बेचा जा सकता है? दर्शक कब तक इस कहानी पर भरोसा करेंगे? आखिर कब तक वे उस झूठी हाइप का हिस्सा बनते रहेंगे, जो अब हकीकत से कोसों दूर है? अब तो भारतीय फैंस को डर है कि पाकिस्तान को जीत तो मिल नहीं रहीं तो इस बार नकवी महिलाओं वाली ट्रॉफी लेकर गायब ना हो जाए.
पाकिस्तान मैच पर कौन लगाएगा पैसा?
पाकिस्तान की हालत बेहद खराब है. उसकी बल्लेबाजी में कोई दम नहीं है और जब तक इसमें सुधार नहीं होता, तब तक मुकाबले में कोई बराबरी नहीं हो सकती. जो टीम 55 रन पर ऑलआउट हो जाए, उसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी नहीं कहा जा सकता. मेरी चिंता यहां क्रिकेट से ज्यादा ब्रॉडकास्ट के नजरिए से है आखिर पैसा वहीं से आता है और भारत-पाकिस्तान मुकाबले को इस पूरे खेल का सबसे बड़ा कमाई वाला मैच माना जाता है. महिला एशिया कप अपने आप में एक लो-की टूर्नामेंट है. भारत-पाकिस्तान मुकाबले को छोड़ दें तो बाकी मैचों को बेचना ही मुश्किल है. आखिर कौन थाईलैंड या हांगकांग के मैच के लिए पैसे खर्च करेगा? राइट्स होल्डर के लिए सिर्फ भारत-पाकिस्तान मुकाबला ही ऐसा मैच है, जो बड़ी कमाई कर सकता है. उसी कमाई के जरिए टूर्नामेंट के बाकी मैचों को सब्सिडाइज किया जाता है. यही वजह है कि भारत और पाकिस्तान को अक्सर एक ही ग्रुप में रखा जाता है.
अगर ब्रॉडकास्ट से मिलने वाला पैसा नहीं हो, तो इस तरह के टूर्नामेंट का आयोजन ही मुश्किल हो सकता है. लेकिन असली समस्या तब पैदा होती है, जब पाकिस्तान इस एक मुकाबले में भी कोई चुनौती पेश करने में नाकाम रहता है। अगर भारत-पाकिस्तान मुकाबले की अहमियत ही खत्म हो गई, जैसा कि अब दिखाई दे रहा है, तो फिर पूरे टूर्नामेंट को बेचा कैसे जाएगा? ब्रॉडकास्टर के पास स्पॉन्सर्स को दिखाने के लिए क्या बचेगा? और आखिर स्पॉन्सर्स इसमें पैसा क्यों लगाएंगे?
पुरुष और महिला दोनों टीमें कर रही है सेरेंडर
शनिवार को पाकिस्तान की तरफ से जिस चीज ने सबसे ज्यादा निराश किया, वह थी संघर्ष की कमी. 55 रन पर ऑलआउट होने के बाद फातिमा सना का शैफाली वर्मा की तरफ इशारा करना जरूर एक अनावश्यक आक्रामकता थी, लेकिन इसके अलावा पाकिस्तान की पूरी टीम बेहद फीकी नजर आई. किसी भी बल्लेबाज ने भारत के खिलाफ मुकाबला लेने की कोशिश नहीं की. भारतीय स्पिनर्स ने पाकिस्तान की बल्लेबाजी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया. न कोई इरादा नजर आया और न ही कोई ठोस रणनीति. इसके बावजूद पीसीबी अध्यक्ष मोहसिन नकवी से कोई सवाल पूछे जाने की उम्मीद नहीं है. नकवी का ध्यान शायद ट्रॉफी देने और फोटो खिंचवाने के मौके पर ज्यादा रहेगा.
पाकिस्तान क्रिकेट को पोपट बना रहा है नकवी
पाकिस्तान क्रिकेट अब पतन के ऐसे दौर में पहुंच चुका है, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा. महिला क्रिकेट लगातार बदतर हो रहा है और पुरुष टीम की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. भारत-पाकिस्तान मुकाबले को लेकर बनाई जाने वाली हाइप भी अब ज्यादा दिन नहीं टिकेगी. अगर लोगों ने हकीकत को अभी तक नहीं पहचाना है, तो जल्द ही वे उसे देख लेंगे. सोनी पर अंजुम चोपड़ा और मिताली राज दोनों का मानना था कि भारत को बल्लेबाजी में और ज्यादा प्रयोग करने चाहिए थे. यह सुनना अपने आप में बहुत कुछ कहता है. बात अब यहां तक पहुंच चुकी है कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ प्रयोग कर सकता है, क्योंकि मुकाबले में प्रतिस्पर्धा ही नहीं बची है. मोहसिन नकवी और उनकी टीम को इस कड़वी हकीकत पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें ट्रॉफी सौंपने और एक के बाद एक विवाद खड़े करने के लिए फोटो खिंचवाने से ज्यादा जरूरी पाकिस्तान क्रिकेट की इस बदहाल स्थिति का समाधान तलाशना है.


