श्री कृष्ण के 99 बच्चों की अनसुनी कहानी जानें उनके वीर पुत्रों और रहस्यमयी पुत्रियों के बारे में!


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Shri Krishna sons and daughters story: श्रीकृष्ण को याद करने पर हमेशा हमारे मन और मस्तिष्क में उनकी ऐसी छवि बनती हैं, जिसमें वो नटखट माखन चोर, गांव के ग्वाले, महाभारत कुरुक्षेत्र में अर्जुन के दिव्य सारथी और भगवत गीत पर ज्ञान देने वाले ज्ञानी या राधा रानी के प्रियतम कृष्ण हैं. जबकि बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि, कृष्ण केवल योद्धा, दार्शनिक और राजनेता ही नहीं, बल्कि एक पिता भी थे.

पौराणिक ग्रंथों की माने तो कृष्ण की 16,108 पत्नियां थी और उनके 1,80,000 पुत्र थे. हिंदू धार्मिक ग्रंथों में मुख्य रूप से कृष्ण के 99 पुत्रों का ही उल्लेख देखने को मिलता है. 

आज भगवान श्रीकृष्ण के बच्चों के बारे में शायद ही कभी बातचीत की जाती है. उनके पुत्र और पुत्रियां जो आज भी कृष्ण के दिव्य कारनामों की छाया में छिपे हुए हैं. आइए कृष्ण के भूले हुए पुत्रों और पुत्रियों के बारे में जानते हैं, सबसे पहले उन लोगों से शुरू करते हैं, जिनके बारे में सबसे अधिक जानकारी है.

कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न

कृष्ण के सबसे पुत्र जो रुक्मिणी से हुए थे, उनका नाम प्रद्युम्न था. उन्हें कामदेव जिन्हें प्रेम का देवता भी कहा जाता है, इसका आंशिक अवतार भी माना जाता है. एक योद्धा के रूप में वे यदुवंश के प्रमुख व्यक्ति और योद्धा माने जाते हैं.

द्वारका को दुश्मनों के आक्रमणों से बचाने के लिए उनकी भूमिका काफी अहम मानी जाती है. उनका जन्म और उत्थान मानव रूप में कृष्ण की दिव्य शक्ति का प्रतीक है. 

कृष्ण जाम्बवती का पुत्र सांबा

कृष्ण की प्रमुख पत्नी जाम्बवती से उनका दूसरा पुत्र सांबा का जन्म हुआ था. सांबा जो अपने अहंकार के लिए काफी प्रसिद्ध था. उसके द्वारा पूजनीय ऋषियों का मजाक बनाना, जिसके परिणामस्वरूप उसे श्राप मिला कि, यादवों का पतन हो जाएगा.

सांबा का जीवन काफी महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह दिखाता है कि, दिव्य व्यक्तित्वों की संतानें भी किस्मत और कर्मफल से बच नहीं सकती है. 

रुक्मिणी-कृष्ण का पुत्र चारु देशना

रुक्मिणी से एक अन्य पुत्र की प्राप्ति जिसका नाम चारु देशना, जिसे भगवान श्रीकृष्ण के युद्धों में सबसे करीबी साथियों में याद किया जाता है. महाभारत में चारो देशना राजकुमार का उल्लेख यादव सेनाओं के एक भाग के रूप में मिलता है.

वे अपनी वीरता और निडरता के लिए जाने जाते हैं. सांबा के विपरीत वे अपने कुल के अनुशासन और युद्ध भावना को बनाए रखने के लिए भी प्रसिद्ध है. 

श्रीकृष्ण पुत्र भानु की महत्वता

श्रीकृष्ण और रुक्मिणी से एक और पुत्र हुआ जिसका नाम भानु पड़ा, जो अपने नाम की तरह तेजस्वी और साहसी था. शास्त्रों में उनका उल्लेख अपनी माता के वंश का गौरव बनाए रखने के रूप में किया जाता है.

उनके बारे में सीमित जानकारी ही मौजूद होने के नाते बावजूद विष्णु पुराण में भानु को कृष्ण के सबसे प्रख्यात पुत्रों में गिना जाता है. 

द्वारका का रक्षक पुत्र गदा

रुक्मिणी के पुत्रों में से एक पुत्र गदा भी था, जिसका नाम शक्ति और गदा अस्त्र का प्रतीक है. गदा को द्वारका के रक्षक के तौर पर याद किया जाता है. श्रीकृष्ण के पुत्र गदा को देखकर उनके वंश की शौर्य शिक्षा का प्रभाव देखने को मिलता है. 

श्रीकृष्ण के बेटों के साथ उनके पोते भी महाप्रतापी और साहसी थे. श्रीकृष्ण के जाने के बाद यादव वंश ने अपने ही परिवारों के बीच युद्ध छेड़ दिया, लेकिन व्रच बच गए और बाद में पांडवों ने उन्हें मथुरा का शासक भी बना दिया. उनके पिता अनिरुद्ध थे, जो प्रद्युम्न के पुत्र के रूप में कृष्ण के पोते थे.

द्वारका के विनाश के बाद उनके इन वंशजों ने कृष्ण के वंशों को आगे बढ़ाने का काम किया.

रुक्मिणी के 10 पुत्र

विष्णु पुराण के अनुसार, कृष्ण और रुक्मिणी के 10 पुत्र और एक पुत्री थे. जिनके नाम हैं-

  • प्रद्युम 
  • चारुदेश्न
  • सुदेश्न
  • चारुदेह
  • सुचारु
  • चारुगुप्त
  • भद्रचारु
  • चारुचंद्र
  • विचारु
  • चारु

जाम्बवती के 10 पुत्र

जाम्बवती से भी कृष्ण के 10 पुत्रों का एक समूह था, जिसमें सबसे बड़ा पुत्र सांबा था. अन्य पुत्र में सुमित्रा, पुरुजित और अन्य पुत्र शामिल थे, जिनके नाम में हरिवंश में देखने को मिलता है. जाम्बवती के पुत्र अपने वीरता और साहस के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन सांबा को मिले श्राप के कारण ही यदुवंश का अंत हुआ.

सत्यभामा के 10 पुत्र

कृष्ण की प्रिय रानियों में सत्यभामा भी शामिल थीं, जिनसे उन्हें 10 पुत्र हुए थे. इस बात का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में देखने को मिलता है. लेकिन महाकाव्यों में उनका उल्लेख कम प्रमुखता से किया गया है. विष्णु पुराण में उनके नाम श्रीकृष्ण के विशाल वंश को दर्शाते हैं. 

धार्मिक ग्रंथों में विशेष तौर पर श्रीकृष्ण के पुत्रों पर ही बल दिया है, लेकिन उनमें उनकी पुत्रियों का भी जिक्र होता है, जिनका विवाह आर्यवर्त के राजपरिवारों में हुआ था. पुत्रियों की शादियां राजनीतिक नजरिए से बेहद खास मानी जाती थी, क्योंकि इनसे गठबंधन मजबूत होते ही यदुवंश का प्रभाव बढ़ा. दुर्भाग्य की बात ये है कि, उनमें से कोई भी नाम संरक्षित नहीं हैं.

कृष्ण के 99 बच्चों की संख्या संयोगवश नहीं है, कई परंपराओं और मान्यताओं में यह पूर्णता से ठीक पहले की अपूर्णता का प्रतीक है. श्रीकृष्ण की असंख्य संतानें मानव समाज में दिव्य विस्तार के विचार को दिखाती है, जो कई वंशों में धर्म का प्रचार-प्रसार करती हैं. 

जब कृष्ण ने देह त्यागा और द्वारका सागर में पूरी तरह से समा गई तो उनके अधिकांश वंशज समाप्त हो गए. फिर भी, ब्रज और कुछ बचे हुए वंशजों के माध्यम से कृष्ण का वंश महाभारत काल के बाद भी रहा. इस तरह उनके बच्चे इतिहास की सबसे महान और दिव्य सभ्यतागत परिवर्तनों के साक्षी बने.

कृष्ण के 99 बच्चे हमे याद दिलाते हैं किस, ईश्वर भी साधारण लोगों में शामिल थे, मार्गदर्शन करते हुए, रक्षा करते हुए और हानि को सहते हुए भी. 

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



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