2026 में 13 महीनों का हिंदू नव वर्ष! ज्येष्ठ मास में होगा बड़ा बदलाव, जानें अधिकमास का रहस्य और महत्व


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Vikram samvat 2083: अंग्रेजी कैलेंडर में नया साल जनवरी से शुरू होता है, लेकिन हिंदू परंपरा में समय की गणना विक्रम संवत के अनुसार की जाती है. हर साल की शुरुआत चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से होती है. आने वाला विक्रम संवत 2083 कई मायनों में बेहद खास होने वाला है. अधिक मास जुड़ने की वजह से ज्येष्ठ माह लगभग 58–59 दिनों तक चलेगा.

यही कारण है कि इस वर्ष पंचांग में 13 महीने होंगे, जो एक दुर्लभ खगोलीय और पंचांगीय घटना है. पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि साल 2026 में हिंदू कैलेंडर का नया साल नवसंवत्सर 2083 इस बार 13 महीनों का होगा. कारण कि इस नवसंवत में अधिकमास ( मलमास) आएगा. इस कारण एक महीना बढ़ जाएगा.

ज्येष्ठ माह अधिकमास होगा. यह ज्येष्ठ अधिकमास 17 मई से 15 जून तक रहेगा. इससे आगे के महीनों के व्रत त्योहार 15 से 20 दिन देरी से आएंगे. 19 मार्च से विक्रम संवत लगेगा, इसी दिन से गुड़ी पड़वा, वासंती नवरात्र की शुरुआत होती है.

हिंदू नया वर्ष 12 नहीं बल्कि पूरे 13 महीनों का- ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि भगवान विष्णु ने इस अधिक महीने को अपना नाम देकर इसकी महिमा सभी महीनों से ज्यादा कर की है. जब चांद-सूरज की चाल अपनी लय बदलती है और पंचांग अचानक एक अतिरिक्त महीना जोड़ देता है, तब साल सिर्फ आगे नहीं बढ़ता तो इसके मायने भी बदल जाते हैं.

हिंदू नया वर्ष 12 नहीं बल्कि पूरे 13 महीनों का होगा. यह अतिरिक्त महीना ही मलमास कहा जाता है. जिसे लोग अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं. लोक मान्यता है कि यह महीना भगवान विष्णु की खास कृपा बरसाने वाला समय होता है और इसी कारण इसे आध्यात्मिक रूप से सबसे पावन काल माना जाता है.

अधिकमास से जुड़ी पौराणिक कथाएं

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि कथाओं में वर्णन मिलता है कि जब एक अतिरिक्त महीना उत्पन्न हुआ तो कोई भी देवता उसे अपनाने को तैयार नहीं था. तब भगवान विष्णु ने उसे अपने संरक्षण में लिया और उसे ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में प्रतिष्ठित किया. यही कारण है कि यह समय देवों में भी सर्वोच्च माना जाता है. मान्यता है कि इस अवधि में की गई साधना जीवन में सौभाग्य, शांति और आध्यात्मिक उत्थान लेकर आती है.

पंचांग के अनुसार अधिकमास 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून 2026 को समाप्त होगा. इस पूरे महीने को वरदान माना जाता है. यह तप, जप, ध्यान, भक्ति और दान का महापवित्र समय होगा. मान्यता है कि अधिक मास के पहले दिन व्रत रखने से पापों का क्षय होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है.

पंचांग में एक ऐसा समय माना जाता है जब सांसारिक और मांगलिक कार्यों को विराम देकर आध्यात्मिक साधना को प्राथमिकता दी जाती है. यह महीना हर तीन साल में एक बार आता है और इसका उद्देश्य पंचांग की गणितीय समायोजन को संतुलित करना होता है, पर धार्मिक रूप से इसे अत्यंत पवित्र माना गया है.

इस साल घटेगा अनोखा घटनाक्रम 2 ज्येष्ठ महीने!

विक्रम संवत 2083 में अधिक मास पड़ रहा है और वह भी ज्येष्ठ (जेठ) माह में. इसका सीधा अर्थ है:
एक नहीं, बल्कि दो-दो ज्येष्ठ महीने रहेंगे
एक सामान्य ज्येष्ठ मास

दूसरा अधिक ज्येष्ठ (पुरुषोत्तम मास)
अधिक मास जुड़ने की वजह से ज्येष्ठ माह लगभग 58–59 दिनों तक चलेगा. यही कारण है कि इस वर्ष पंचांग में 13 महीने होंगे- जो एक दुर्लभ खगोलीय और पंचांगीय घटना है.
अधिक ज्येष्ठ मास
आरंभ: 17 मई 2026
समाप्ति: 15 जून 2026
सामान्य ज्येष्ठ मास
आरंभ: 22 मई 2026
समाप्ति: 29 जून 2026
यानी इस अवधि में दोनों महीने एक-दूसरे के साथ ओवरलैप भी करेंगे.

13वां महीना होगा अधिक मास

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि विक्रम संवत 2083 में ज्येष्ठ का अधिक मास होने से ये साल 12 नहीं बल्कि 13 महीनों का रहेगा. अधिक मास यानी इस साल ज्येष्ठ का महीना 30 नहीं बल्कि 60 दिनों का होगा. ज्येष्ठ का अधिक मास 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा.

अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं. धर्म ग्रंथों में इसका विशेष महत्व बताया गया है. इस महीने में मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि पर रोक रहती है.

क्यों लगता है मलमास

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि सूर्य और चंद्र कैलेंडर के बीच का फर्क ही इस अद्भुत महीने को जन्म देता है. सौर वर्ष 365 दिन का होता है और चंद्र वर्ष 354 दिन.

यह अंतर हर 32 महीने और 16 दिनों में इतना बढ़ जाता है कि पंचांग को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ना पड़ता है. इसी अतिरिक्त महीने को अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है.

मांगलिक कार्यों से परहेज

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि परंपराओं में कहा गया है कि मलमास के दौरान विवाह जैसे शुभ संस्कार, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, भूमि पूजन या किसी नए व्यवसाय की शुरुआत नहीं करनी चाहिए.

ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए शुभ कार्य अपेक्षित फल नहीं देते और ग्रह-नक्षत्र भी मांगलिक कर्मों के अनुकूल नहीं माने जाते. इसी कारण इस पूरे अवधि में बड़े संस्कारों को स्थगित करने की सलाह दी जाती है.

क्यों जरूरी है अधिक मास

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू धर्म में लगभग सभी व्रत त्योहार चंद्रमा की तिथियों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं. चंद्रमा लगभग 29 दिनों में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है, जिसे एक चंद्र मास कहते हैं. जब चंद्रमा पृथ्वी के 12 चक्कर लगा लेता है तो इसे एक चंद्र वर्ष कहते हैं जो लगभग 355 दिन का होता है.

वहीं सौर वर्ष 365 का होता है. अगर अधिक मास की व्यवस्था न हो तो हिंदू व्रत-त्योहार हर साल 10 दिन पीछे खिसकते चले जाएंगे, जिससे दिवाली बारिश में और होली शीत ऋतु में मनाई जाने लगेगी. ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही हमारे विद्वानों में अधिक मास की व्यवस्था की है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 



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