साल 2006 का क्रिकेट का मैदान सिर्फ एक खेल का गवाह नहीं बन रहा था, बल्कि इतिहास की किताबें दोबारा लिखी जा रही थीं. पाकिस्तानी बल्लेबाज मोहम्मद युसूफ (Mohammad Yousuf) के हाथों में बल्ला मानों कोई जादुई छड़ी बन चुका था. उस एक अकेले साल में उन्होंने टेस्ट क्रिकेट के इतिहास को नए सिरे से तराशा. 11 मैचों की 19 पारियों में केवल एक बार नाबाद रहते हुए उन्होंने 99.33 की अविश्वसनीय औसत से 1,788 रन बना डाले.
मोहम्मद युसूफ के रिकॉर्ड को छूना एक ख्वाब
मोहम्मद युसूफ ने 2,854 गेंदों का सामना करते हुए और 62.64 की स्ट्राइक रेट से खेलते हुए युसूफ ने चौकों-छक्कों की बरसात कर दी. उनके बल्ले से 222 चौके और 12 छक्के निकले. उन्होंने न सिर्फ 202 रनों का अपना सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाया, बल्कि एक कैलेंडर ईयर में 9 शतक जड़कर एक ऐसा रिकॉर्ड कायम कर दिया, जिसे छूना आज भी दुनिया के किसी भी दिग्गज बल्लेबाज के लिए एक ख्वाब जैसा है. इस जादुई सफर में उनके नाम 3 अर्धशतक और केवल 1 शून्य दर्ज हुआ.
रिकी पोंटिंग की स्वर्णिम फॉर्म
युसूफ जब इस महान रिकॉर्ड को गढ़ रहे थे, ठीक उसी साल ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग (Ricky Ponting) भी रन बनाने के एक अलौकिक मूड में थे. पोंटिंग ने 2006 में ही केवल 10 मैचों की 18 पारियों में अपना जलवा बिखेरा. 3 बार नाबाद लौटते हुए उन्होंने 88.86 की शानदार औसत से 1,333 रन ठोके. 196 के सर्वोच्च स्कोर और 60.78 की स्ट्राइक रेट के साथ खेले पोंटिंग ने उस साल 2,193 गेंदों का सामना किया और 139 चौकों व 7 छक्कों की मदद से 7 शतक और 4 अर्धशतक अपने नाम किए. वो बिना किसी शून्य के पूरे साल विरोधी गेंदबाजों पर हावी रहे.
विवियन रिचर्ड्स का वो बेखौफ शहंशाह
लेकिन टेस्ट क्रिकेट में एक साल में सबसे ज्यादा शतक बनाने की इस ऐतिहासिक होड़ की शुरुआत 2006 से बहुत पहले हो चुकी थी. यह कहानी हमें ले जाती है साल 1976 में, जब वेस्टइंडीज के बेखौफ शहंशाह सर विवियन रिचर्ड्स (Vivian Richards) ने दुनिया को आक्रामक टेस्ट बल्लेबाजी का सही मतलब सिखाया था. बिना किसी हेलमेट के, बेबाक अंदाज में बल्लेबाजी करते हुए रिचर्ड्स ने 11 मैचों की 19 पारियों में 90.00 की औसत से 1,710 रन कूट दिए थे. 291 रनों की अपनी मैराथन पारी के दम पर उन्होंने 72.85 की तूफानी स्ट्राइक रेट से रन बनाए. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक उन्होंने कम से कम 1,584 गेंदें खेलीं और 179 से ज्यादा चौके तथा 7 छक्के जड़कर 7 शतक और 5 अर्धशतक जमाए. रिचर्ड्स का यह रिकॉर्ड दशकों तक अटूट रहा और टेस्ट क्रिकेट का बेंचमार्क बना रहा.
श्रीलंकाई मास्टर क्लास अरविंद डिसिल्वा का जलवा
इस रिकॉर्ड बुक्स में अगला सुनहरा पन्ना जोड़ा श्रीलंका के मास्टर क्लास बल्लेबाज अरविंदा डिसिल्वा (Arvinda de Silva) ने. साल 1997 में डिसिल्वा का बल्ला स्विंग और स्पिन के हर आक्रमण को ध्वस्त कर रहा था. 11 टेस्ट मैचों की 19 पारियों में 3 बार नाबाद रहते हुए उन्होंने 76.25 की औसत से 1,220 रन बनाए. 168 रनों के उच्चतम स्कोर, 2,075 गेंदों के धैर्य और 149 चौकों व 6 छक्कों की बदौलत उन्होंने 7 शतक और 2 अर्धशतक अपने खाते में जोड़े. हालांकि इस सफर में वो 2 बार शून्य पर भी आउट हुए, लेकिन उनकी शतकीय पारियों ने श्रीलंकाई क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया.
‘मास्टर ब्लास्टर’ की अविश्वसनीय वापसी
शताब्दी बदली, वक्त बदला, लेकिन रनों की भूख नहीं बदली. साल 2010 में ‘क्रिकेट के भगवान’ कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) ने अपने करियर के उत्तरार्ध में एक बार फिर साबित किया कि उनका क्लास स्थायी है. सचिन ने 2010 में 14 टेस्ट मैचों की 23 पारियों में 3 बार नाबाद रहकर 78.10 की बेहतरीन औसत से 1,562 रन बनाए. 214 रनों की कप्तानी पारी, 2,794 गेंदों का धैर्यपूर्ण सामना और 55.90 की स्ट्राइक रेट के साथ सचिन ने 181 चौके और 10 छक्के लगाए. बिना किसी शून्य के, उन्होंने 7 शतक और 5 अर्धशतक जड़कर एक बार फिर साबित कर दिया कि क्यों दुनिया उन्हें महानतम मानती है.
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