एक समय का सुपरहिट ऐप अब क्यों पड़ रहा पुराना, 25 करोड़ यूजर्स के बावजूद क्यों खतरे में है ट्रूकॉलर?


ट्रूकॉलर आज दुनिया भर में स्पैम कॉल्स और अनजान नंबर्स की पहचान करने वाला एक प्रमुख ऐप है, लेकिन भारत में इसका भविष्य खतरे में पड़ता नजर आ रहा है. सरकार के पेश किए जा रहे CNAP (Calling Name Presentation) फीचर की वजह से ट्रूकॉलर की जरूरत खत्म होने की आशंका जताई जा रही है. आइए जानते हैं ट्रूकॉलर की पूरी कहानी, इसकी शुरुआत से लेकर मौजूदा संकट तक.

ट्रूकॉलर की नींव 2009 में स्वीडन के स्टॉकहोम शहर में रखी गई थी. इसके फाउंडर एलन मामेदी (Alan Mamedi) और नामी जारिंगहलम (Nami Zarringhalam) थे, जो रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्र थे. उस समय दोनों को अनजान नंबर्स से आने वाली कॉल्स की समस्या का सामना करना पड़ता था. उन्होंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा ऐप बनाया जाए जो कॉलर की पहचान बताए.

शुरू में ट्रूकॉलर को ब्लैकबेरी फोन के लिए डिजाइन किया गया था, लेकिन जल्द ही यह एंड्रॉयड और iOS प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो गया. कंपनी का नाम ट्रू सॉफ्टवेयर स्कैंडिनेविया एबी रखा गया, जो अब एक पब्लिक कंपनी है और स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड है.

ट्रूकॉलर की सफलता की कहानी बेहद दिलचस्प है. शुरुआती दिनों में यह ऐप क्राउडसोर्सिंग पर बेस्ड था, जहां यूजर्स खुद नंबर्स को नाम और स्पैम के रूप में मार्क करते थे. इससे डेटाबेस लगातार बढ़ता गया. 2012 तक ट्रूकॉलर ने ग्लोबली काफी पॉपुलैरिटी हासिल कर ली, लेकिन भारत में इसकी असली उड़ान 2014 के आसपास शुरू हुई.

भारत में स्पैम कॉल्स की समस्या बहुत बड़ी है. TRAI के मुताबिक हर महीने करोड़ों स्पैम कॉल्स रिपोर्ट होती हैं. ट्रूकॉलर ने यहां 25 करोड़ से ज्यादा यूजर्स बना लिए, जो इसका सबसे बड़ा मार्केट है. कंपनी ने भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लोकल डेटा स्टोरेज शुरू किया और 2018 से सभी भारतीय यूजर्स का डेटा भारत में ही रखा जाने लगा.

आज ट्रूकॉलर के ज्यादातर कर्मचारी भारतीय हैं, और इसका हेडक्वार्टर स्टॉकहोम में होने के बावजूद भारत कंपनी की रीढ़ की हड्डी बन चुका है. हाल ही में, नवंबर 2024 में फाउंडर्स ने ऑपरेशनल रोल से हटकर रिशित झुनझुनवाला को CEO बनाया, जो कंपनी के नए चरण की ओर इशारा करता है.

ट्रूकॉलर का बिजनेस मॉडल मुख्य रूप से फ्रीमियम है. बेसिक फीचर्स फ्री हैं, लेकिन प्रीमियम सब्सक्रिप्शन से एड-फ्री एक्सपीरिएंस, एडवांस स्पैम ब्लॉकिंग और वेरिफाइड बैज जैसे फीचर्स मिलते हैं. कंपनी का रेवेन्यू ऐड्स, सब्सक्रिप्शन और बिजनेस सॉल्यूशंस से आता है. लेकिन अब CNAP फीचर इस पूरी कहानी को बदल सकता है.

CNAP क्या है?
यह टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) द्वारा प्रस्तावित एक नेटवर्क-लेवल फीचर है, जो मोबाइल नेटवर्क पर ही कॉलर का नाम दिखाएगा. यानी, अनजान नंबर से कॉल आने पर फोन स्क्रीन पर नाम खुद-ब-खुद दिखेगा, वह बिना किसी थर्ड-पार्टी ऐप के. CNAP KYC (Know Your Customer) डेटा पर बेस्ड होगा, जो सरकारी आईडी से जुड़ा होता है, इसलिए ये ट्रूकॉलर के क्राउडसोर्स्ड नामों से ज्यादा एक्यूरेट और भरोसेमंद होगा.

TRAI ने CNAP को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया है, और जल्द ही इसे सभी टेलीकॉम ऑपरेटर्स जैसे Jio, Airtel और Vi पर लागू किया जाएगा. इसका मकसद स्पैम कॉल्स कम करना और यूजर प्राइवेसी बढ़ाना है.

ट्रूकॉलर यूजर्स को ऐप इंस्टॉल करने और कॉन्टैक्ट्स, लोकेशन जैसी परमिशंस देने की जरूरत पड़ती है, लेकिन CNAP में ऐसा कुछ नहीं. इसी को देखते हुए ऐसा माना जा रहा है कि भारत में 25 करोड़ यूजर्स होने के बावजूद, लोग ट्रूकॉलर को अनइंस्टॉल कर सकते हैं क्योंकि CNAP फ्री और बिल्ट-इन होगा.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रूकॉलर को अपना बिजनेस मॉडल बदलना पड़ेगा- शायद AI-बेस्ड फ्रॉड डिटेक्शन या दूसरे वैल्यू-एडेड सर्विसेज पर फोकस करके. नहीं तो भारत में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है.

हालांकि, ट्रूकॉलर ने CNAP पर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन कंपनी के प्रवक्ताओं ने कहा है कि वे यूजर सेफ्टी के लिए प्रतिबद्ध हैं.

क्या ट्रूकॉलर पूरी तरह बंद हो जाएगा?
शायद नहीं, लेकिन भारत में इसकी लोकप्रियता में बड़ी गिरावट आ सकती है. एक समय का इनोवेशन अगले पल पुराना होता दिखाई दे रहा है.



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