कार में काले शीशे: नियम, जुर्माना और सुरक्षा पर असर


नई दिल्ली. नई दिल्‍ली. जयपुर में राजस्थान विधानसभा परिसर 9 जनवरी को उस समय सियासी अखाड़ा बन गया, जब भाजपा विधायक बाल मुकंदाचार्य काले शीशे वाली कार में विधानसभा पहुंचे. विधानसभा गेट पर ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने बाल मुकंदाचार्य की कार रुकवा दी और कहा कि बाबाजी का काले शीशे वाली कार में चलना गैरकानूनी है और यह कानून का उल्लंघन है. डोटासरा ने कहा कि जो नेता कानून की दुहाई देते हैं, वही खुद कानून तोड़ रहे हैं. इस प्रकरण ने एक बार फिर गाडियों के काले शीशों को चर्चा में ला दिया है. दरअसल, कार में काला शीशा (Tinted Glass) लगवाना भारत में पूरी तरह से जुर्म नहीं है, लेकिन अतिरिक्त काली फिल्म या ज्यादा डार्क कलर का शीशा लगाना गैरकानूनी है.

भारत में काले शीशों को लेकर मुख्य नियम केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 के नियम 100 और सुप्रीम कोर्ट के अभिषेक गोयनका बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले से बने हैं. कार खरीदने के बाद अगर कोई काली फिल्म लगवाई है, तो यह गैर-कानूनी है और इस पर भारी जुर्माना लग सकता है. पुलिस ऐसी फिल्‍म को मौके पर ही हटा सकती है. कारों में काले शीशों को लेकर क्‍या नियम-कानून हैं, लोग इन्‍हें क्‍यों लगवाते हैं और गाड़ी के इंश्‍योरेंस और ड्राइवर और यात्रियों की सेफ्टी पर ये क्‍या असर डालते हैं, आइये विस्‍तार से जानते हैं…

सवाल 1: लोग अपनी कारों में ब्लैक फिल्म या टिंटेड शीशा क्यों लगवाते हैं?
जवाब: अक्‍सर लोग गर्मी से बचाव, प्राइवेसी, गाड़ी को प्रीमियम लुक देने और खुद को वीआईपी दिखाने के लिए के लिए शीशे काले करवाते हैं. कई बार कार मालिक नियमों की सही जानकारी न होने के कारण भी मॉडिफिकेशन की दुकानों पर जाकर ऐसी फिल्में लगवा लेते हैं. हालांकि, शौक चाहे जो भी हो, कानून के सामने यह पूरी तरह अवैध है.
सवाल 2: भारत में कार की खिड़कियों पर ब्लैक फिल्म लगाने को लेकर क्या कानून है?
जवाब: भारत में इस संबंध में कानून स्पष्ट है. सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक गोयनका बनाम भारत संघ मामले में साफ किया था कि कार खरीदने के बाद बाहर से किसी भी तरह की फिल्म (चाहे वह काली, रंगीन, स्मोक्ड या रिफ्लेक्टिव हो) लगाना पूरी तरह गैर-कानूनी है. भले ही वह फिल्म पारदर्शी ही क्यों न दिखे, उसे लगाना मना है.
केंद्रीय मोटर वाहन नियम (CMVR), 1989 (नियम 100) विजिबल लाइट ट्रांसमिशन (VLT) के मानक तय करता है. इस नियम के अनुसार, फ्रंट और रियर विंडशील्ड कम से कम 70% विजिबिलिटी होनी चाहिए. साइड विंडो में कम से कम 50% विजिबिलिटी होनी चाहिए. कार कंपनियां फैक्ट्री से ही हल्का टिंटेड ‘प्राइवेसी ग्लास’ दे सकती हैं जो इन मानकों को पूरा करता हो, लेकिन ग्राहक अपनी तरफ से कोई ‘फिल्म’ नहीं चिपका सकता.

सवाल 3: काले शीशे पाए जाने पर कितना जुर्माना और दंड भुगतना पड़ सकता है?
जवाब: मोटर वाहन अधिनियम के तहत इसे एक गंभीर उल्लंघन माना जाता है. देश के विभिन्न राज्यों में इसका जुर्माना ₹100 से लेकर ₹2,000 तक हो सकता है. दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में पुलिस इस पर काफी सख्त है. ट्रैफिक पुलिस के पास यह अधिकार है कि वह गाड़ी को रोककर मौके पर ही अपने हाथों से या कटर की मदद से फिल्म हटवा दे. यदि आप दोबारा इसी गलती के साथ पकड़े जाते हैं, तो आपका ड्राइविंग लाइसेंस रद्द किया जा सकता है या गाड़ी को जब्त (Impound) किया जा सकता है.
सवाल 4: कार में ब्लैक फिल्म लगवाने से क्‍या कार असुरक्षित हो जाती है?
जवाब: काली फिल्म ड्राइवर की ‘विजिबिलिटी’ को कम कर देती है. खासकर रात के समय, भारी बारिश या घने कोहरे में ड्राइवर को बाहर की वस्तुएं स्पष्ट नहीं दिखतीं, जिससे जानलेवा दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है. पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का तर्क है कि काले शीशों की आड़ में अपराधी गाड़ी के भीतर अपहरण, अवैध हथियारों की तस्करी या छेड़छाड़ जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं. बाहर से अंदर न देख पाने की वजह से सुरक्षाकर्मी संकट में फंसे व्यक्ति की पहचान नहीं कर पाते.
सवाल 5: क्या मंत्रियों, विधायकों या VIPs को काले शीशे लगाने की कोई विशेष छूट प्राप्त है?
जवाब: कानून सबके लिए बराबर है, लेकिन सुरक्षा एक अपवाद है. सुप्रीम कोर्ट के 2012 के आदेश के अनुसार, केवल उन्हीं व्यक्तियों को छूट दी जा सकती है जो भारत सरकार द्वारा ‘अति विशिष्ट सुरक्षा श्रेणी’ (जैसे Z+ या Z श्रेणी) में आते हैं. यह छूट केवल तभी मिलती है जब SPG, IB या RAW जैसी एजेंसियां इसकी लिखित सिफारिश करें और सरकार द्वारा आधिकारिक अनुमति पत्र जारी किया गया हो. सामान्य तौर पर किसी मंत्री, विधायक या सांसद को उनकी निजी कार में ब्लैक फिल्म लगाने की कोई संवैधानिक अनुमति नहीं है, जब तक कि उन्हें विशेष सुरक्षा खतरा न हो. राजस्थान में हुआ विवाद इसी नियम की अनदेखी का परिणाम था.
सवाल 6: क्या लग्जरी या इलेक्ट्रिक कारों के लिए नियम अलग होते हैं?
जवाब: बिल्कुल नहीं. चाहे आपकी कार ₹5 लाख की हो या ₹5 करोड़ की, और चाहे वह पेट्रोल से चले या बिजली (EV) से, नियम सभी के लिए एक समान हैं. कुछ लग्जरी कारों में फैक्ट्री से ही ‘प्राइवेसी ग्लास’ आते हैं जो कानूनी मानकों (VLT) के भीतर होते हैं. यदि कार के शीशे फैक्ट्री-फिटेड हैं, तो वे वैध हैं, लेकिन उन पर अतिरिक्त कोटिंग करना गैर-कानूनी है.
सवाल 7: क्या ब्लैक फिल्म आपके कार इंश्योरेंस (बीमा) को प्रभावित कर सकती है?
जवाब: जी हां, यह एक ऐसा पहलू है जिस पर अक्सर लोग ध्यान नहीं देते. मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी के नियमों के अनुसार, वाहन में किया गया कोई भी ऐसा बदलाव (Modification) जो देश के कानून का उल्लंघन करता हो, आपके दावे को कमजोर कर सकता है. यदि आपकी कार किसी हादसे का शिकार होती है और बीमा कंपनी को पता चलता है कि विजिबिलिटी कम होने (काले शीशों) की वजह से दुर्घटना हुई, तो वे ‘कानून के उल्लंघन’ का हवाला देकर आपका क्लेम पूरी तरह खारिज या कम (Reject or Deduct) कर सकते हैं.

सवाल 8: पुलिस काले शीशों की जांच कैसे तय करती है?
जवाब: आधुनिक पुलिसिंग में अब सिर्फ आंखों से देखकर चालान नहीं काटा जाता. इसके लिए दो विधियां अपनाई जाती हैं. VLT मीटर (टिंट मीटर) को शीशे के ऊपर लगाया जाता है और यह तुरंत बता देता है कि शीशे से कितनी प्रतिशत रोशनी पार हो रही है. यदि शीशे पर बाहरी फिल्म की परत, बुलबुले या किनारे से उखड़ी हुई फिल्म दिखती है, तो पुलिस बिना मीटर के भी ‘अवैध मॉडिफिकेशन’ के तहत कार्रवाई कर सकती है.



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