मोबाइल इंटरनेट गैप से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 3 ट्रिलियन डॉलर नुकसान


दुनियाभर में आज भी करीब 3.4 अरब लोग मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. GSMA की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर का संभावित नुकसान हो रहा है.

दिलचस्प बात यह है कि मोबाइल नेटवर्क अब दुनिया के ज्यादातर हिस्सों तक पहुंच चुका है. फिर भी बड़ी आबादी इंटरनेट से जुड़ी नहीं है. यानी नेटवर्क मौजूद है, लेकिन लोग उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे. इसे ‘यूसेज गैप’ कहा जाता है.

इन 3.4 अरब लोगों में से लगभग 30 करोड़ लोगों के पास नेटवर्क कवरेज ही नहीं है. जबकि करीब 3.1 अरब लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां नेटवर्क उपलब्ध है, लेकिन वे मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते.

आखिर वजह क्या है?
सबसे बड़ी समस्या है लागत. कई देशों में स्मार्टफोन और डेटा प्लान अब भी महंगे हैं. इसके अलावा डिजिटल जानकारी की कमी, स्थानीय भाषा में कंटेंट की कमी और कई लोगों का केवल वाई-फाई पर निर्भर रहना भी बड़ी वजह है.

कुछ अमीर देशों में स्थिति काफी अलग है. उदाहरण के लिए, कतर जैसे देश में 5G नेटवर्क पूरे देश में मजबूत तरीके से उपलब्ध है और वहां मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल 80% तक पहुंचने की उम्मीद है. वहीं जॉर्डन, ट्यूनीशिया, मिस्र, मोरक्को और अल्जीरिया जैसे देशों में 2030 तक भी इंटरनेट इस्तेमाल 20–30% के आसपास रहने का अनुमान है.

इंटरनेट क्यों है जरूरी?
मोबाइल इंटरनेट सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है. यह शिक्षा, डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन बिजनेस और बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच आसान बनाता है. खासकर महिलाओं और छोटे व्यापारियों के लिए यह आर्थिक सशक्तिकरण का बड़ा जरिया बन सकता है.

जब लोग और कंपनियां ऑनलाइन आती हैं, तो उन्हें नए बाजार मिलते हैं, लागत कम होती है और काम करने की रफ्तार बढ़ती है. छोटे-छोटे फायदे मिलकर बड़ी आर्थिक वृद्धि में बदल जाते हैं.

आगे की चुनौती
5G का विस्तार हो रहा है और 6G पर भी चर्चा शुरू हो चुकी है. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अच्छी तरह से बना 4G नेटवर्क आम यूज़र्स के लिए काफी है.

अब एक बड़ा सवाल यह है कि इंटरनेट ट्रैफिक बढ़ने और AI जैसी तकनीकों के आने से नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे में इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च कौन उठाएगा?

साफ है कि बाकी आबादी को इंटरनेट से जोड़ना सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक चुनौती भी है. जब तक यह ‘यूसेज गैप’ खत्म नहीं होता, तब तक दुनिया की पूरी विकास क्षमता हासिल नहीं हो पाएगी.



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