Garuda Purana Death Signs Explained in Hindi। गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के पहले मिलने वाले संकेत


Garuda Purana Death Signs: कभी आपने महसूस किया है कि कुछ लोग अपने आख़िरी दिनों में अचानक बदल जाते हैं बातचीत कम, चेहरा शांत, और जैसे भीतर ही भीतर कोई तैयारी चल रही हो? मृत्यु एक ऐसा सच है जिससे हम सभी परिचित हैं, फिर भी उसके बारे में खुलकर बात करने से बचते हैं. लेकिन भारतीय परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु को लेकर कई संकेतों और अनुभवों का उल्लेख मिलता है. खासतौर पर गरुड़ पुराण में मृत्यु से पहले दिखाई देने वाले शारीरिक और मानसिक लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया गया है. आज हम इन्हीं मान्यताओं, अनुभवों और आधुनिक नजरिए के बीच संतुलन बनाते हुए समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर इन संकेतों का अर्थ क्या है और समाज इन्हें कैसे देखता है. आइए जानते हैं प्रीति सिंह एक्सपर्ट न्यूमेरोलॉजी एवं मेडिकल एस्ट्रोलॉजी से.

नाभि से शुरू होती है मृत्यु की आहट?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरीर में सात चक्र होते हैं और मृत्यु की आहट सबसे पहले नाभि चक्र में महसूस होती है. कहा जाता है कि यह प्रक्रिया अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे शुरू होती है. कई ग्रामीण इलाकों में बुजुर्ग आज भी मानते हैं कि जब व्यक्ति की ऊर्जा नाभि से कमजोर होने लगती है तो शरीर संकेत देने लगता है.

हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे अलग नजरिए से देखता है. प्रीति सिंह बताती हैं कि डॉक्टरों के अनुसार गंभीर बीमारियों में शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करते हैं, जिससे भूख कम लगना, कमजोरी और थकान जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.

यमदूत या मानसिक भ्रम?
अंतिम दिनों में दिखते हैं अनजाने चेहरे
गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि मृत्यु से पहले व्यक्ति को यमदूत दिखाई दे सकते हैं. कई परिवारों ने ऐसे अनुभव साझा किए हैं जहां मरीज ने अंतिम दिनों में कहा कि कोई उसे बुला रहा है या कमरे में कोई मौजूद है. विशेषज्ञों का कहना है कि जीवन के आखिरी चरण में ऑक्सीजन की कमी, दवाइयों का असर या मानसिक स्थिति के कारण भ्रम (hallucinations) हो सकते हैं. लेकिन धार्मिक आस्था रखने वाले लोग इसे आत्मा के परलोक गमन की तैयारी मानते हैं.

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परछाई गायब होना और सांसों का बदलना
लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि मृत्यु से कुछ समय पहले व्यक्ति को अपनी परछाई धुंधली दिखने लगती है या वह नाक की नोक नहीं देख पाता. सांसों की गति भी बदल जाती है धीमी, अनियमित या उलटी चलने जैसी अनुभूति. एक्सपर्ट इसे शरीर के अंतिम चरण का हिस्सा बताते हैं. सांसों का पैटर्न बदलना, जिसे मेडिकल भाषा में “चेन-स्टोक्स रेस्पिरेशन” कहा जाता है, कई गंभीर मरीजों में देखा जाता है.

मानसिक और भावनात्मक बदलाव
अचानक शांति या पुरानी यादों का उभरना
कई परिवार बताते हैं कि अंतिम दिनों में व्यक्ति बेहद शांत हो जाता है. जैसे उसे जीवन से कोई शिकायत नहीं रही. कुछ लोग अपने बचपन, अधूरे काम या रिश्तों की बातें करने लगते हैं.

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब व्यक्ति को अपने अंत का आभास होता है, तो वह अपने जीवन का आंतरिक मूल्यांकन करने लगता है. यही वजह है कि पछतावे, संतोष या स्वीकार्यता जैसे भाव उभरते हैं.

दिवंगत परिजनों का एहसास
कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें अपने गुजर चुके माता-पिता या रिश्तेदार आसपास महसूस होते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार आत्मा को परलोक से बुलावा मिलता है और पुरानी आत्माएं साथ देने आती हैं. वहीं चिकित्सा विज्ञान इसे न्यूरोलॉजिकल प्रतिक्रिया मानता है.

आस्था बनाम विज्ञान: समाज किस ओर?
भारत जैसे देश में जहां धर्म और परंपरा गहराई से जुड़े हैं, वहां मृत्यु को केवल जैविक घटना नहीं माना जाता. यह एक आध्यात्मिक यात्रा भी है. गांवों में आज भी लोग इन संकेतों को गंभीरता से लेते हैं, जबकि शहरों में शिक्षित वर्ग वैज्ञानिक व्याख्या पर भरोसा करता है. फिर भी, एक बात दोनों मानते हैं जीवन सीमित है. इसलिए अपनों से संवाद, अधूरे रिश्तों को सुलझाना और मन की शांति जरूरी है.

मृत्यु के संकेतों को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं. कुछ इसे धार्मिक सत्य मानते हैं, कुछ वैज्ञानिक प्रक्रिया. लेकिन इन चर्चाओं का मूल संदेश यही है कि जीवन को सजगता और प्रेम से जिया जाए, क्योंकि अंत का समय अनिश्चित है.



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