दुनिया की अकेली कार जो लकड़ी, कोयले और कागज को जलाने से चलती है, दौड़ती 61 किमी की स्पीड से
ये दुनिया की सबसे पुरानी चलने वाली विंटेज कार है, नाम है ला मार्क्विज. इसे 141 साल पहले फ्रांस में बनाया गया था. तीन लोगों डि डियोन, बॉटन और ट्रेपारडॉक्स ने मिलकर बनाया था. यह इस कार को कोयला, लकड़ी और कागज से चलाया जाता है. इसकी अधिकतम गति थी 61 किमी प्रति घंटा.
इसे लकड़ी, कागज और कोयले से कैसे चलाया जाता है, ये हम आपको आगे बताएंगे. लेकिन ये जान लीजिए ये कार आज भी चलने लायक है, चलाई भी जाती है. इस कार को कई बार नीलामी में रिकॉर्ड कीमत पर बेचा गया.
ये दो स्टीम इंजन से चलती है
ये कार ऑटोमोबाइल इतिहास में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, क्योंकि इसने आधुनिक वाहनों की नींव रखी.ये कार दो स्वतंत्र टैंडम-कंपाउंड स्टीम इंजनों द्वारा चलाई जाती थी. जो इसमें नीचे लगे होते थे. हर इंजन आगे और पीछे के पहियों को स्पीड के लिए ताकत देता था. दोनों सिलेंडर स्टीम इंजन 5200 आरपीएम पर 2 हॉर्सपावर की शक्ति पैदा करते थे. पॉवर को बेल्ट ड्राइव के माध्यम से पहियों तक पहुंचाया जाता था, जो कभी-कभी फिसलने की समस्या पैदा करता था.

सीट के नीचे लगा था 150 लीटर का पानी का टैंक
कार में चार लोगों के लिए सीटिंग व्यवस्था थी जिसमें पीछे के ड्राइवर और सामने के यात्री के पीछे की ओर मुंह करके बैठते थे. कार में एक वर्टिकल बॉयलर था, जो कोयले, लकड़ी और कागज के टुकड़ों से संचालित होता था. पानी का टैंक सीट के नीचे था, जिसमें 150 लीटर पानी की क्षमता थी, जिससे ये कार 32 किमी चलाई जा सकती थी. इसे चलाने के लिए 30-35 पहले स्टार्ट कर दिया जाता है ताकि इसमें पर्याप्त स्टीम बन जाए.
1884 में ला मार्क्विज का निर्माण एक बहुत छोटे बॉयलर के साथ किया गया, जिसमें फर्श के नीचे दो सिलेंडर लगे थे जो लोकोमोटिव क्रैंक के माध्यम से पिछले पहियों को पास-पास चलाते थे. सीट के नीचे एक टैंक में पानी रखा जाता था और बॉयलर के चारों ओर एक चौकोर बंकर में कोक या कोयला रखा जाता था. कोक को नीचे की दराजों से निकाला जाता था. बॉयलर के बीच में लगे एक पाइप के माध्यम से नीचे जलती आग जलती रहती थी. जिससे स्टीम बनता था.
ये कार 9 फीट लंबी है
इसमें “स्पेड हैंडल” स्टीयरिंग थी. शुरुआत में कोई सस्पेंशन नहीं था. पहिए धातु के थे, जिन्हें बाद में रबर बैंड से लपेटा गया. जब ये कार बनी, तो इसकी स्पीड देखकर लोग हैरान रह जाते थे. यह केवल 9 फीट लंबी और करीब 2100 पाउंड वजनी थी, जो इसे उस समय के अन्य स्टीम वाहनों की तुलना में हल्का और कॉम्पैक्ट बनाता था.

ये कई मालिकों के पास रही
1887 में ला मार्क्विज दुनिया की पहली ऑटोमोबाइल रेस में दौड़ाया गया. जिसमे इस कार ने 60 किमी/घंटा की स्पीड निकालकर दिखाई. अब तक ला मार्किज के केवल चार मालिक रहे हैं. सबसे ज्यादा ये 81 सालों तक फ्रांस के डोरियोल परिवार के पास रही. फिर 1987 में इंग्लैंड के टिम मूर ने इसे $90,000 यानि 78 लाख रुपयों में खरीदा. इसे चलाने लायक बनाया.
चार साल पहले नीलामी में ये 40 करोड़ में बिकी
जब टिम मूर ने 1987 में ला मार्क्विज को खरीदा, तब यह चलने की स्थिति में नहीं थी. तब उन्होंने इसके कई उपकरणों को रिसर्च करने के बाद फिर से बनवाया. पहले विश्व युद्ध के दौरान हटाए गए ब्रास फिटिंग्स और पाइप्स को फिर से बनवाया. एक साल में ये कार चमचमाती हुई विंटेज कार बन गई.
वर्ष 2011 में ये सोथेबी नीलामी में फिर बिकी, अबकी बार इसको 40 करोड़ में खरीदा गया, किसने खरीदा इसकी कोई जानकारी नहीं है. ये कार कई अवार्ड भी जीत चुकी है.

141 साल पुरानी अकेली कार जो अब भी चल सकती है
तो इस तरह आप कह सकते हैं कि ला मार्क्विज अकेली ऐसी कार है जो 141 साल पुरानी होने के बाद भी अब तक चल सकती है और इसे कभी कभार चलाया भी जाता है लेकिन ये पेट्रोल से नहीं बल्कि लकड़ी, कोयला और कागज जलाकर स्टीम के जरिए चलाई जाती है. जब ये कार बनाई गई तो ये पॉपुलर हुई. लेकिन बाद में पेट्रोल इंजन आने के बाद इस कार की तकनीक ने इसको अव्यवहारिक बना दिया.
जब पेट्रोल कारें आईं तो इसका उत्पादन बंद हो गया
स्टीम वाहनों का उत्पादन 1904 तक तो किसी तरह होता रहा, वो भी मुख्य रूप से बसों और ट्रकों के लिए, लेकिन ला मार्किज जैसे छोटे स्टीम वाहनों का उत्पादन जल्द ही बंद हो गया. क्योंकि ये स्टीम कारें भारी, जटिल और रखरखाव में महंगी थीं. इसके उलट पेट्रोल कारें हल्की, तेज़ और उपयोग में आसान थीं.
1884 में बनी ये कार आज भी उस दौैर में बनी अकेली कार जो चल सकती है. इसके समकालीन स्टीम वाहन या तो नष्ट हो चुके हैं या संग्रहालयों में प्रदर्शन के लिए रखे जा चुके हैं.
आज भी ला मार्क्विज अधिकतम गति 38 मील प्रति घंटा हासिल कर सकती है. हालांकि ये उस गति से कहीं अधिक है जिस पर सुरक्षित रूप से गाड़ी चलाई जा सकती है, क्योंकि इसमें बुनियादी हैंडलिंग और असली ब्रेक का अभाव है. 1884 में केवल ट्रेनें ही इससे तेज़ चलती थीं.
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